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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/१६७

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कविता-कौमुदी
 

ज्ञान को भूषन ध्यान है ध्यान को भूषन त्याग।
त्याग को भूषन शांति पद तुलसी अमल अदाग॥६१॥
तुलसी मिटै न मोहनम किये कोटि गुन ग्राम।
हृदय कमल फूलै नहीं बिनु रवि कुल रवि राम॥६२॥
सुनत लखत श्रुति नयन बिनु रसना बिनु रस लेत।
बास नासिका बिनु लहै परसै बिना निकेत॥६३॥
सोई ज्ञानी सोइ गुनी जन सोइ दाता ध्यानि।
तुलसी जाके चित भई राग द्वेष की हानि॥६४॥


 

विनय पत्रिका

गाइये गनपति जगबंदन संकरसुवन भवानीनंदन
सिद्धिसदनगजबदन बिनायक कृपासिंधु सुंदर सब लायक
मोदक प्रिय मुद मंगल-दाता विद्या वारिधि बुद्धि विधाता
माँगत तुलसिदास कर जेारें बसहिँ रामसियमानसमोरे


बावरी रावरो नाह भवानी

दानि बड़ा दिन देत दये बिनु बेद बड़ाई भानी
निज घर की बर बात बिलोकछु हो तुम परम सयानी
सिव की दई संपदा देखत श्री सारदा सिहानी
जिनके भाल लिखी लिपि मेरी सुख की नहीं निसानी
तिन रंकन को नाक सँवारत हैं। आयों नकबानी
दुःख दीनता दुःखी इनके दुःख जाचकता अकुलानी
यह अधिकार सौंपिये औरहिँ भीख भली मैं जानी
प्रेम प्रसंसा विनय व्यंग जुत सुनि बिधि की वर बानी
तुलसी मुदित महेस मनहिँ मन जगत मातु मुसुकानी॥