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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/१६८

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तुलसीदास
११३
 

ऐसी तोहि न बूझिये हनुमान हठीले।
साहेब कहूँ न राम से तोसे न बसीले॥
तेरे देखत सिंह को सिसु-मेढ़क लीले।
जानत हौं कलि तेरेऊ मनु गुनगान कीलें॥
हाँक सुनत दस कन्ध के भये बन्धन ढीले।
सो बल गयो किधौं भये अब गर्बगहीशे॥
सेवक को परदा फटै तुम समरथ सीले।
अधिक आपु ते आपनो सुनि मान सहीले॥
साँसति तुलसीदास की सुनि सुजस तुहीलै।
तिहूँ काल तिनको भलो जे राम रँगीले॥

श्री रामचन्द्र कृपालु भजुमन हरन भव भय दारुनं।
नव कंज लोचन कंजमुख करकंज पद कंजारूनं॥
कन्दर्प अगनित अमितं छवि नव नील नीरज सुन्दरं।
पटपीत मानछु तड़ित रुचि सुचि नौमि जनक सुतावरं॥
भजु दीनबन्धु दिनेस दानव दैत्यवंस निकंदनं।
रघुनन्द आनँद कन्द कौसलचन्द दसरथ नन्दनं॥
शिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदार अङ्ग विभूषनं।
आजानु भुज शर चाप घर संग्राम जित खर दूषनं॥
इमि बदत तुलसीदास शंकर शेष मुनि मनरंजन।
मम हृदय कंज निवास करु कामादि खलदल-गंजनं॥


मेरो मन हरि हठ न तजै

निस दिन नाथ देउँ सिख बहु विधि करत सुभाव निजै।
ज्यों जुवती अनुभवति प्रसव अति दारुन दुःख उपजै॥