पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१५७

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( १४२ ) उदाहरण-२ गुण वर्णन (कवित्त) गोरे गात, पातरी, न लोचन समात मुख, उर उरजातन की बात अब रोहिये । हसति कहत बात, फूल से भरत जात, ओंठ अवदात राती देख मन मोहिये । स्यामल कपूरधूर की अोढनी ओढ़े उड़ि, धूरि ऐसी लागी 'केशो' उपमा न टोहिये । काम ही की दुलही सी काके कुलउलहीसु, लहलही ललित लतासी लोल सोहिये ॥१०॥ गोरा शरीर है पतली-दुबली है लोचन मानो मुख मे समाते ही नहीं और कुचो की बात तो हृदय मे अकित कर लेना चाहिए । जब हँसती हुई बाते करती है, तब कूल से झडते जाते है । सुन्दर ओठो की लाल लाल रेखा मन को मोहे लेती है। 'कपूरधूर' की काली ओढनी ओढे हुए है । वह ऐसी लगती है मानो कपूर की वूल ही उडकर अग पर आ लगी हो । 'केशवदास' कहते है कि उसकी उपमा ही ढूँढना व्यर्थ है। कामदेव की दुलही-रति के समान न जाने यह किसके कुल में उत्पन्न हुई है । वह लहलही लता के समान सुन्दर और चचल है । २-विभावना दोहा कारज को बिनु कारणहि, उदौ होत जेहि ठौर। तासों कहत विभावना, 'केशव' कविसिरमौर ॥११॥ 'केशवदास' कहते हैं कि जहाँ बिना कारण ही कार्य का उदय होता है, वहाँ श्रेष्ठ कविगण उसे विभावना कहते है ।