पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१५८

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उदाहरण ( कवित्त) पूरन कपूर पान खाये जैसी मुख-बास, ___ अधर अरुण रुचि सुधा सों सुधारे है। चित्रित कपोल, लोल लोचन, मुकुट, ऐन, अमल झलक, झलकनि मोहि मारे है। भृकुटी कुटिल जैसी न करहू होसिं, आंजी ऐसीखै 'केशोराय' हेरि हारे है। काहे के सिगार कै बिगारति है मेरी आली, तेरे अङ्ग बिनाही सिगार के सिगारे हैं ॥१२॥ तेरे मुख की सुगंध कपूर ( अथवा पान खाये हुए मुख की तरह है।) तेरे लाल ओठ मानो अमृत मे सने हुए है । तेरे चित्रित गालो तथा चचल नेत्रो ने अपनी निर्मल झलक से दर्पण तथा हिरणो को मोहित करके मार डाला है । तेरी भौंहे ऐसी टेढी है कि वैसी बनाने पर भी नहीं बन पातीं। आँखें मानो काजल लगी हुई सी है जिन्हे देख केशवराय (श्रीकृष्ण ) भी हार गये है। हे सखी । तू शृगार करके अपने अगो को क्यो बिगाडती है ? तेरे अग तो बिना शृगार किये ही शृगार किये से जान पडते है। विभावना दूसरी दोहा कारण कौन हु आनते, कारज होय जु सिद्ध । जानौ अन्य विभावना, कारण छोड़ि प्रसिद्ध ॥१३॥ जहाँ प्रसिद्ध कारण को छोडकर किसी दूसरे कारण से कार्य सिद्ध होता है, वहाँ दूसरे प्रकार की विभावना समझो।