पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१७९

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( १६४ ) जहा सान्तवना और उपदेश दे-देकर, पति को रोका जाता है, वहाँ शिक्षाक्षेप होता है । उसे यहाँ बारह प्रकार से वर्णन किया गया है। १-चैत्रवर्णन छप्पय फूली लतिका ललित, तरुनितर फूले तरुवर । फूली सरिता सुभग, सरस फूल सब सरवर ॥ फूली कामिनि कामरूपकरि कतनि पूजहि । शुक-सारी-कुल केलि फूलि कोकिल कल कूजहि ॥ कहि केशव ऐसी फूल महि शूलन फूल लगाइये । पिय आप चलन की को कहै चित्त न चैत चलाइये ॥२४॥ चेत्र मे सुन्दर लताएँ, पूर्ण युवती होकर, फूल रही है । सुन्दर पेड भी फूल रहे है । नदियाँ तथा तालाब आदि भी फूले हुए है. अर्थात् प्रसन्न दिखलाई पडते है। कामिनियाँ भी फूली हुई है और कामोत्तेज्जित होकर अपने-अपने पति की पूजा में लग रही है। तोता मैना, फूल कर क्रीडा कर रहे है और कोयल भी फूलकर ध्वनि कर रही है। ( 'केशवदास' नायिका की ओर से कहते है कि ) हे प्रियतम । ऐसी फूल मे (प्रसन्नता के वातावरण मे ) आप शूल ( काटे ) न चुभाइये अर्थात् रग मे भग न कीजिए । हे प्रियतम | इस चैत मास में आपके चलने की बात कौन कहे, चलने का विचार तक न करना चाहिए। २–वैशाख वर्णन केशवदास अकास अवनि बासित सुवास करि । बहत पवन गति मंद गात, मकरंद बिदु धरि॥ दिशि विदिशिनि छवि लाग भाग पूरित परागवर । होत गन्ध ही अन्ध बौर भौरा विदेशि नर ॥