पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/२२५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


( २०८ ) श्रीरघुनाथ गनो असमर्थ न, देखि बिना रथ हथिहि घोरहि । तोथो शरासन शंकर को जिहि, शोच कहा तुव लक न तोरहि ॥५६॥ (मन्दोदरी ही फिर कह रही है कि ) जब दूसरे ( सुग्रीव ) का अपराध करके उनके हाथ से बालि नहीं बच सका, तब तुम उन्हीं का अपराध करके कैसे बचोगे ? ( केशवदास मन्दोदरी की ओर से कहने है कि ) जब उन्होने क्षीर समुद्र मथ डाला, तब इस छोटे समुद्र को क्यो न बॉधलेंगे। इसलिए तुम श्रीरघुनाथ जी को, बिना रथ, घोडे और हाथियो के देख असमर्थ न समझो । जिन्होने श्रीशङ्कर जी का धनुष तोड डाला, वह तुम्हारी लङ्क ( कमर ) को न तोड सकेगा-इसमे सोच-विचार ही क्या है। अद्भूत रसवत उदाहरण (१) कवित्त आशीविष, सिन्धु विष, पावक सों नातों कछू हुतो प्रह्लाद सों, पिता को प्रेम टूटो है। द्रौपदी की देह में खुशी ही कहा दु.शासन, खरोई खिसानों खैचि बसन न खूटो है। पेट में परीछित की, पैठि के बचाई मीचु, जब सब ही को बल विधवान लूटो है। केशव अनाथन को नाथ जो न रघुनाथ, हाथी कहा हाथ कै हथ्यार करि छूटो है ॥६१॥ जिस समय पिता का प्रेम टूट गया, उस समय सर्प हलाहल विष, तथा अग्नि से क्या प्रह्लाद का कुछ नाता था (जो वह बच गया ) ? द्रौपदी की देह मे क्या वस्त्रो की धरोहर रखी हुई थी, जो दुशासन