पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/२५२

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( २३५ ) है ( ऐसी गॅवारिन सो) तुम्ही प्रेम को नहीं निबाहते ( तुम ही न बाहो नेहु )। [ इसमे ऊपर से श्रीकृष्ण की प्रशसा अँचती है पर है वास्तव मे निन्दा । उधर नायिका की निन्दा प्रतीत होती है पर है वास्तव मे स्तुति उदाहरण ब्याजस्तुति कवित्त केसर, कपूर, कुंद, केतकी, गुलाब लाल, सूधत न चपक चमेली चार तोरी है। जिनकी तू पासवान बूझियत, आस पास, ठाढ़ी 'केशोदास' किन्ही भय भ्रम भोरी है । तेरी कौनो कृति किधौ सहज सुबास ही ते, ___ बसि गई हरि चित कहूँ चोरा चोरी है । सुनहि । अचेत चित, आई यह हेत, नाही, तोसो ग्वारि गोकुल मे गोबरहारी थोरी है ॥२४॥ जब से तेरी देह की सुगन्ध पाली है, तब से लाल ( श्रीकृष्ण ) केसर, कपूर, कुन्द, केतकी और गुलाब को सूघते तक नहीं और सुन्दर चमेलियो को तो उन्होने तोडकर फेंक दिया है। केशवदास ( सखी की ओर से ) कहते है कि तू जिनकी दासी जैसी जान पडती है, ऐसी बहुत सी सुन्दरियाँ उनके आस-पास भय और भ्रम मे विमूढ होकर खडी है । यह तेरा ही कोई जादू है या स्वाभाविक सुवास ही के कारण तू ही श्री कृष्ण के चित्त मे चुपचाप बस गई है ? सुन | वह