पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/२६८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


। २५१ । बाजत है मृदुहास मृदग, सुदिपति दीपन को उजियारो। देखतही हरि देखि तुम्है यह, होत है आंखिनही मे अखारो ॥२०॥ ___ हे हरि ? देखते हो, तुम्हे देखकर आँखों मे ही सगीत का अखाडा बन जाता है। 'केशवदास' कहते है इस अखाडे मे काली सफेद काछनो पहने हुए पुतलिया पातुरे ( वेश्याएँ ) है। जो करोडो कटाक्ष है, वे ही गति भेद है। स्नेह को, नचाने वाला निराला नायक मानो। उसमे मृदुहास का मृदग बजता है । और उसकी दीप्ति को दीपको का उजाला मानो। ( इसमे परम्परा छोड कर मनमाने ढग से वर्णन किया गया है।) ३२-दीपक अलङ्कार दोहा वाचि, क्रिया, गुण, द्रव्य को, बरणहु करि इक ठौर । दीपक दीपति कहत है, केशव कवि शिरमौर ॥२१॥ 'केशवदास' कहते है कि जहाँ पर वर्ण्यवस्तु के अनुरूप ही उसकी क्रिया और गुण को भी समुचित स्थान पर वर्णन किया जाता है, उसे कवि शिरमौर 'दीपक' अलकार कहते है । दीपक के भेद ___दोहा दीपक रूप अनेक है, मै बरणे द्वै रूप। मणिमाला तासों कहै, केशव सब कविभूप ॥२२॥ 'केशवदास' कहते है कि 'दीपक' के, अनेक भेद है, परन्तु मैने उसके दो रूपो का ही वर्णन किया है। उन दोनो भेदो को सभी कविराज लोग (१) मणि और (२) कहते है।