पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/३१२

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( २९४ ) यमक के भेद दोहा सुखकर दुखकर भेद द्वै, सुखकर बरणे जान । यमक सुनो कविराय अब, दुखकर करौं बखान ॥२६॥ यमक के सुखकर और दुखकर दो मेद फिर हैं। अब तक सुखकर अर्थात् सरल यमको का वर्णन किया गया है। हे कविराय । सुनो, अब मै दुखकर ( कठिन ) यमको का वर्णन करता हूँ। दुखकर यमक कवित्त मानसरोवर आपने, मानस मानस चाहि । मानस हरिके मीन को, मानस वरणेताहि ॥२७॥ हे मान-सरोवर ( अनिभान के सरोवर ) मनुष्य । अपने मानस (मन) मे माँ ( मक्ष्मी) को नस अर्थात् नश्य समझ । हरिरूपी मान-सरोवर की मछली अर्थात् हरिभक्ति मे डूबने वालो को तू मानस ( साधारण ) मनुष्य कहता है। दुखकर यमक-२ दोहा बरणी बरणी जात क्यो, मुनि धरणी के नेश । रामदेव नरदेव मणि, देव देव जगदीश ॥२८॥ हे धरणी के ईश अर्थात् हे राजन् । मुझसे वरणी ( यज्ञ मे वरण किए हुए ब्राह्मणो को दिया हुआ दान ) कैसे वर्णन किया जा सकता है । क्योकि श्रीरामचन्द्रजी नरदेव अर्थात् राजाओ मे श्रेष्ठ, देव-देव अर्थात् देवताओ में श्रेष्ठ और जगत के स्वामी है।