पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/३४६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


( ३२८ ) वश मे ही है और दास है अत: वही केलि ( क्रीडा ) वनी है अर्थात् क्रीडा स्थली है और बलमा (प्रियतम ) भी वहीं है । व्यस्त गतागत सवैया सैनन माधव, ज्यो सर के सबरेख सुदेश सुवेश सबै । नैनवकी तचि जी तरुणी रुचि चीर सबै निमिकाल फलै ।। तै न सुनी जस भीर भरी धरि धीरऽबरीत सु का न वहै । मैनमनी गुरुचाल चलै शुभसो बन मे सरसी व लसै ॥७२॥ माधव को सैन ( शयन, नींद ) आती। सुदेश (सुन्दर ) और सुवेश (अच्छे वेशवाली ) सभी स्त्रियाँ उन्हे बारण समान ज्ञात होती हैं। उन्होने जी मे तजकर ( दुखी होकर जलकर ) नैनव अर्थात् नयी नीति को अपनाया है । अन्य तरुरिणयो की रुचि ( शोभा ) और चीर ( वस्त्र) उन्हें नीम तथा कालफल ( इन्द्रायण) जैसे कटु लगते है। वहाँ स्त्रियो की जितनी भीड रहती है, उसे क्या तूने नहीं सुना ? वे स्त्रियाँ इतनी सुन्दर है कि उन्हे देखकर रीति अर्थात् कुल मर्यादा का वहन कौन कर सकता है ? भाव यह है कि उन्हे देख लेने पर कुलमर्यादा का निर्वाह करना कठिन है-विचलित हो जाने की सम्भावना है। पर वह मैनमणि अर्थात् कामदेव जैसा सुन्दर नायक गुरुचाल ( मर्यादा को चाल) पर चलता है और वह शुभ नायक (श्रीकृष्ण ) इस समय वन मे सरसी ( जलाशय ) के निकट बैठा है। सवैया इसे उलट कर पढने से जो सवैया बनेगा वह इस प्रकार है :- (४) शैल बसा रसमैनवशोभ सु लै चल चारुगुणी मनमै । (३) है बनको सु, ति, री, बर, धीर, धरी, भर, भीसजनीसुनते ।। (२) लै फल कामिनि, वैसरची, चिरु, नीरुतजीचितकीवनने । (१) वैससुवेशसदेसुखरेबसकैरसज्योंबधमाननसै ॥७३॥