पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/३४५

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( ३२७ ) व्यस्त गतागत दोहा सूधो उलटो बॉचिये, औरै औरै अर्थ । एक सवैया मे सुकवि, प्रकटत होइ समर्थ ।।७०।। जहाँ सीधा और उलटा पढने मे दूसरे-दूसरे अर्थ निकलें उसे व्यस्त गतागत कहते है । ऐसे एक भी सवैया मे कवि की सामर्थ्य प्रकट हो जाती है। उदाहरण गतागत सवैया मासम सोह, सजै वन, वीन नवीन वजै, सहसोम समा । मार लतानि बनावत सारि रिसति वनावनि ताल रमा ।। मानप हीरहि मोरद मोद दमोदर मोहि रही वनमा । मालबनी वल केशवदास सदा नशकेल बनीबलमा ॥१॥ तू मा ( लक्ष्मी ) जैसी सुशोभित है, वन सजा हुआ है नवीन वीणाएँ बज रही है। सोम अर्थात् चन्द्रमा समा ( छटा ) सहित सुशो- भित हो रहा है। तू मा अर्थात् श्री लक्ष्मी जी के समान सुशोभित है । वन सजा हुआ है नवीन वीणाएँ बज रही हैं और चन्द्रमा युक्त चांदनी छिटकी हुई है । मार ( कामदेव ) की लता जैसी सुन्दरियो को, वीणा की घोरियो जैसा जडवत बना अर्थात् उन्हे अपनी राग के आगे तुच्छ बना दे और श्रीताल को बनावट पर रिसा जा अर्थात् क्रोध प्रकट कर ( कि वे अच्छी नहीं बनती। ) मनुष्य के हृदय रूपी मोर को आनन्द देने वाले दामोदर (श्रीकृष्ण ) उसी वन मे हैं। वन की मा अर्थात् शोभा उनपर मोहित हो रही है। मै बलिहारी जाती हू केशव अर्थात् श्रीकृष्ण सदा तेरे