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कामना
विनोद—मुझे तो विश्वास है कि कदापि न होगी सन्तोष—तब जाने दो, उसकी चर्चा व्यर्थ है क्यों जी, आज उपासना में वह कामना नहीं दिखाई पड़ी।
सन्तोष-क्या तुम उससेव्याह किया चाहते हो ? विनोद-उसकी बातें, उसकी भाव-भंगियाँ कुछ समझ मे नही आती। मै तो उससे अलग रहा चाहता हूँ।
विनोद-मेरी गृहस्थी तो व्याह के बिना अधूरी जान पड़ती है। मै तो लीला की सरलता पर प्रसन्न हूँ।
सन्तोष-तुम जानो। अच्छा होता यदि तुम उसी से व्याह कर लेते ?
विनोद-और तुम।
सन्तोप-मैं सन्तुष्ट हूँ-मुझे ब्याह की आव- श्यकता नहीं।
विनोद-अच्छी बात है। चलो, अब घर चलें।
(दोनो जाते हैं । कामना आती है)
कामना-हॉ, तुम हिचकते हो, और मैं तुमसे
घृणा (जीभ दबाती है)।हैं। यह क्या ? इसके क्या
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