पृष्ठ:कुछ विचार - भाग १.djvu/८५

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जाने पर फिर वही कुपथ्य करेंगे ? और चूंकि इस अलहदगी की बुनि- याद भापा है, इसलिए हमें भाषा ही के द्वार से प्रांतीयता की काया में राष्ट्रीयता के प्राण डालने पड़ेंगे। प्रांतीयता का सदुपयोग यह है कि हम उस किसान की तरह जिसे मौरूसी पट्टा मिल गया हो अपनी ज़मीन को खूब जोतें, उसमें खूब खाद डालें और अच्छी से अच्छी फसल पैदा करें। मगर उसका यह आशय हर्गिज़ न होना चाहिये कि हम बाहर से अच्छे बीज और अच्छी खाद लाकर उसमें न डालें। प्रांतीयता अगर अयोग्यता को कायम रखने का बहाना बन जाय तो यह उस प्रांत का दुर्भाग्य होगा और राष्ट्र का भी। इस नये खतरे का सामना करना होगा और वह मेल पैदा करनेवाली शक्तियों को संगठित करने ही से हो सकता है। सज्जनो, साहित्यिक जागृति किसी समाज की सजीवता का लक्षण है । साहित्य की सबसे अच्छी तारीफ़ जो की गई है वह यह है कि वह अच्छे से अच्छे दिल और दिमाग़ के अच्छे से अच्छे भावों और विचारो का संग्रह है। आपने अंग्रेजी साहित्य पढ़ा है। उन साहित्यिक चरित्रों के साथ आपने उससे कहीं ज्यादा अपनापा महसूस किया है जितना आप किसी यहाँ के साहब बहादुर से कर सकते हैं। आप उसकी इंसानी सूरत देखते हैं, जिसमें वही वेदनाएँ हैं, वही प्रेम है, वही कमजोरियाँ हैं जो हममें और आपमें हैं। वहां वह हुकूमत और गुरूर का पुतला नहीं, बल्कि हमारे और आपका-सा इन्सान है जिसके साथ हम दुखी होते हैं, हँसते हैं, सहानुभूति करते हैं । साहित्य बदगुमानियों को मिटानेवाली चीज़ है। अगर आज हम हिन्दू और मुसलमान एक दूसरे के साहित्य से ज्यादा परिचित हों, मुमकिन है हम अपने को एक दूसरे से कहीं ज्यादा निकट पायें । साहित्य में हम हिन्दू नहीं हैं, मुसलमान नहीं हैं, ईसाई नहीं हैं, बल्कि मनुष्य हैं, और वह मनुष्यता हमें और आपको आकर्पित करती है। क्या यह खेद की बात नहीं है कि हम दोनों, जो एक मुल्क में आठ सौ साल से रहते हैं, एक दूसरे के पड़ोस में रहते हैं, एक दूसरे के साहित्य से इतने बेखबर