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कोड स्वराज

हार्वर्ड लॉ रिव्यू उनके काम पर, अपने कॉपीराइटर का जोर दे रहा था। मैंने इसी तरह की बात ‘साइंस' जैसी पत्रिकाओं में भी देखा जहां उन्होंने अपने लेखों को प्रकाशित किया था।

इस तरह की स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए, वर्ष 2016 में एक प्रमुख संस्था ने मुझसे संपर्क किया। इस क्षेत्र में काम करने के लिए, अक्टूबर 2016 में, उन्होंने वर्ष 2017 के लिए 5,00,000 डॉलर और वर्ष 2018 में 4,00,000 डॉलर देने की पेशकश की। हालाँ कि इसमें एक चाल थी। उन्होंने हमारे बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में एक सीट की मांग की और वे मेरे काम पर विस्तृत नियंत्रण हासिल करना चाहते थे। उसमें प्रत्येक काम जैसे जैसे पूरा होता, वैसे वैसे पैसौं का भुगतान किया जाना था। मुझे याद है कि मैं दिनेश त्रिवेदी के बंगले में बैठा था, जब अमेरिका से आये फोन पर मुझे इन शर्तों का पता लगा। फिर मैं बाहर लिविंग रूम में आया और दिनेश और सैम को बताया कि अभी अभी मैंन, 9,00,000 डॉलर का अनुदान को अस्वीकार कर दिया हूँ।

मैंने उस प्रतिष्ठान को समझाया था कि उनके पैस से हमें, सरकार के कार्यों का गहराई से अध्ययन करने में, किसी प्रकार के उल्लंघन पाने पर सरकार और प्रकाशकों को इन उल्लंघन के बारे में सूचित करने में, और फिर शायद वैसे किसी भी लेख को प्रकाशित करने में जो पब्लिक डोमेन में स्पष्ट रूप से है, जैसे कार्यों को करने में सहायता मिलेगी। हालांकि, इसका अधिकांश पैसा किसी पत्रिका के लेख को स्कैन करने (यदि आप इसे बड़े स्तर पर करते हैं) के लिये पुस्तकालय विज्ञान के स्नातक छात्रों को भुगतान करने में ही खर्च हो जाएगा।

हालांकि अनुदान में कोई भी कानूनी खर्च शामिल नहीं होगा। यहां तक कि यदि हमें बड़ी संख्या में, किसी पत्रिका में वैसे लेख मिलते हैं, जो स्पष्ट रूप से पब्लिक डोमेन में हैं और उन्हें हम प्रकाशित करते हैं तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि प्रकाशक, जो ज्यादातर झगड़ालू किस्म के होते हैं, इसके बाद हम पर मुकदमा नहीं करेंगे। अपने बेइमानी से मिले राजस्व प्रवाह को बनाए रखने के लिए, या सिर्फ बदले की भावना से, या हमारे काम में रुकावट डालने के लिये, वे मुकदमें की रणनीति अपनाएंगे।

दूसरे शब्दों में, यह अत्यधिक संकट भरा काम था। मेरा अनुदान अस्वीकार करने का कारण यह था कि मैं, प्रतिष्ठान के अधिकारी को हमारे बोर्ड के सदस्य बनने, और हमारी गतिविधियों पर नियंत्रण रखने की अनुमति नहीं दे सकता था क्योंकि मैंने कभी उनके साथ काम नहीं किया था। कुछ प्रतिष्ठान, कुछ काम करवाने के लिए केवल पैसा देती है। यदि आप उनकी परियोजना पर काम करेंगे, तो वे आपको पैसा देंगे, लेकिन हम ऐसे काम नहीं करते हैं और हम पैसों से पहले, अपने मिशन को महत्व देते हैं।

आखिरकार प्रतिष्ठान फिर वापस आई और जनवरी 2017 में हमें 2,50,000 डॉलर का अनुदान देने के लिए सहमत हो गई। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट जमा होने के बाद, जुलाई में अतिरिक्त राशि 2,50,000 डॉलर देंगे। बाकी बचा हुआ 4,00,000 डॉलर वर्ष 2018 और 2019 में किश्तों के रूप में मिलेगा। यह काफी बड़ा अनुदान था। इसमें बहुत सारे टुकड़ों में पैसे आ रहे थे जैसा कि मैं नहीं चाहता था, फिर भी मैंने कागजात पर हस्ताक्षर कर दिए थे।

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