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पृष्ठ:खूनी औरत का सात ख़ून.djvu/१५८

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खूनी औरत का


खैर आधे घण्टे में जब मैं शांति हुई तो जेलर साहब पुन्नी-मुन्नी को चले जाने के लिये और कांस्टेविल को दूर हटकर पहरा देने के लिये कह और मेरे चचा को कुरसी पर बैठाकर चले गए। थोड़ी देर तक तो हम दोनों फिर रोते, कलपते रहे, इसके बाद मैं पहिले बोली और यों मैंने चचा से कहा,—"चाचा, अब क्या होगा?"

इस पर उन्होंने कहा,—"घबराओ, न बेटी! जब दीनदयाल ने तुम्हारी सहायता के लिये दीनानाथ को भेजा है, तब तुम" निश्चय जानो कि अब तुम्हारा एक बाल भी बांका न होगा। मैंने तुम्हारे मुकदमे का सारा हाल भाई दयालसिंह और वारिस्टर दीनानाथ से सुन लिया है। वे लोग छाती ठोककर यह बात कहते हैं कि, "हम लोग हाईकोर्ट से दुलारी को साफ बचालेंगे।" इस लिये अब तुम नारायण पर भरोसा रखकर अपने चित्त से भय और खेद को दूर करो। आज बारिस्टर साहब मेरे साथ आने वाले थे, पर भाई दयालसिंह के साथ रसूलपुर थाने के कुछ कांस्टेबिलों का सच्चा बयान लेने के लिये वे वहां चले गए हैं और मुझे जेलर साहब के नाम का एक पत्र देकर तुमको ढाढ़स देने के लिये भेजा है। जैसी मुस्तैदी के साथ वे दोनों तुम्हारे मुकद्दमें की पैरवी कर रहे हैं। उससे तो यही बात पाई आती है कि तुम जकर छूट जाओगी।

यह सुनकर मैंने कहा,—"अच्छा, मान लीजिए कि भगवान की दया और आपकी असीस से मैं छूट गई, पर छुटने पर आप मुझे अपनावेंगे?"

इस पर चचाजी यों कहने लगे,—"बेटी, दुलारी! बात यह है कि यहां निर्धन होने के कारण मैं तुम्हारे मुकदमें की पैरवी भी नहीं कर सका था और इसी लज्जा से तुम्हारे सामने आज तक आया भी नहीं था। पर जब भाईजी और बारिस्टर साहब की