पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/१०३

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दुखवा मैं कासे कहूँ मोरी सजनी


गया। फिर नीचे को उन्होंने घूमकर कहा––"दोज़ख के कुत्ते! तेरी यह मजाल!"

फिर कठोर स्वर से पुकारा––"मादूम!"

क्षण-भर में एक भयंकर रूपवाली तातारी औरत बादशाह के सामने अदब से आ खड़ी हुई। बादशाह ने हुक्म दिया––"इस मर्दूद को तहखाने में डाल दे; ताकि बिना खाए-पिए मर जाय।"

मादूम ने अपने कर्कश हाथों में युवक का हाथ पकड़ा, और ले चली। थोड़ी देर में दोनों एक लोहे के मज़बूत दरवाज़े के पास आ खड़े हुए। तातारी बाँदी न चाभी निकाल दरवाजा खोला, और कैदी को भीतर ढकेल दिया। कोठरी की गच क़ैदी का बोझ ऊपर पड़ते ही काँपती हुई नीचे को धसकने लगी!

(२)

प्रभात हुआ। सलीमा को बेहोशी दूर हुई। चौंककर उठ बैठी। बाल सँवारे, ओढ़नी ठीक की, और चोली के बटन कसने को आईने के सामने जा खड़ी हुई। खिड़कियाँ बन्द थीं। सलीमा ने पुकारा––"साक़ी! प्यारी साक़ी! बड़ी गर्मी है, ज़रा खिड़की तो खोल दो। निगोड़ी नींद ने तो आज ग़ज़ब ढा दिया। शराब कुछ तेज़ थी।"

किसी ने सलीमा को बात न सुनी। सलीमा ने ज़रा ज़ोर से पुकारा––"साक़ी!"

जवाब न पाकर सलीमा हैरान हुई। वह खुद खिड़की खोलने