पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/१७८

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गल्प-समुच्चय


इसलिये नहीं कि वे निकम्मे थे; बल्कि इसलिये कि इनके कारण यह अपने आनन्ददायी कुल्हड़ों की नियमित संख्या से बंचित रह जाता था। पड़ोसियों से उसे चिढ़ थी; इसलिये कि वह उसकी अँगीठी से आग निकाल ले जाते थे। इस समस्त विघ्न-बाधाओं से उसके लिये कोई पनाह थी, तो वह यही तोता था। इससे उसे किसी प्रकार का कष्ट न होता था। वह अब उस अवस्था में था, जब मनुष्य को शान्ति-भोग के सिवा और कोई इच्छा नहीं रहती।

तोता एक खपरैल पर बैठा था। महादेव ने पिंजरा उतार लिया और उसे दिखाकर कहने लगा— 'आ, आ, सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता।' लेकिन गाँव और घर के लड़के एकत्र होकर चिल्लाने और तालियाँ बजाने लगे, ऊपर से कौवों ने काँव-काँव की रट लगाई। तोता उड़ा और गांँव से बाहर निकलकर एक पेड़ पर जा बैठा। महादेव खाली पिंजरा लिये उसके पीछे दौड़ा, हाँ दौड़ा। लोगों को उसकी द्रुतगामिता पर अचंभा हो रहा था। मोह की इससे सुन्दर, इससे सजीव, इससे भावमय कल्पना नहीं की जा सकती।

दोपहर हो गया था। किसान लोग खेतों से चले आ रहे थे, उन्हें विनोद का अच्छा अवसर मिला। महादेव को चिढ़ाने में सभी को मजा आता था, किसी ने कंकर फेंके, किसी ने तालियाँ बजाई, तोता फिर उड़ा और यहाँ से दूर आम के बाग में एक पेड़ की फुनगी पर जा बैठा। महादेव फिर खाली पिंजरा लिये मेढक की भाँति उचकता हुआ चला। बाग में पहुँचा, तो पैर के