पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/२३९

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तूती-मैना


सरल-तरल दृष्टि वाली, कोई कान्तिमयी कान्ता, खड़ी-खड़ी मल्लिका-बल्लरी-वितानों के भीतर कबूतरों की क्रीड़ा एवं अलि-अवलि-केलि-लीला देख-देख चकित हो, चिबुक पर तर्जनी अंँगुली रखकर, मन्द-मन्द मुसुकानों की लड़ियाँ गूंँथ रही थीं। मंजुल-मञ्जरी-कलित तरु-वर की शाखाओं पर, शान से तान का तीर मारनेवाली काली-कलूटी कोयल, पल्लवावगुण्ठन में मुंँह छिपाये बैठी हुई, इस अनूपरूपा सुन्दरी को देख रही थी। शीतल-सुरभित समीर विलुलित अलकावली-तीर डोल-डोलकर रस घोल जाता था। चञ्चल पवन अंचल पर लोट-लोटकर अपनी विकलता बताता था। धीरे-धीरे लहराती हुई कालिन्दी की लहरों के सदृश चढ़ाव-उतराववाली, श्याम-सुचिक्कण कुंचित कुन्तलराशि, नित-म्बारोहण करती हुई, आपाद लटक रही थी। यद्यपि निराभरण शरीर पर केवल एक सामान्य वस्त्र ही शेप था; तथापि वह शैवाल-जाल-जटित सुन्दर सरोजनी-सी सोहती और मन मोहती थी। नैनसुख की धोती ही नयनों को सुख देती थी। रुप-रङ्ग में अप्र-तिम होने के कारण अथवा लाड़-प्यार किम्वा संसार से विलग रहने से, न-जाने क्यों—उसके "तूती-मैना" आदि कई एक जंगली नाम पड़े थे। जैसे जल-शून्य वनस्थली में बहुरंगे सुरभित सुमन खिल-खिलकर अछूत और अज्ञात ही रह जाते हैं, उसी तरह वह मंजुभाषिणी सुहासिनी भी उस वन में दिन बिता रही थी।

फूलों को चुन-चुनकर माला गूंथना, कँगना बनाना, बाजूबन्द बनाना, अपने रेशम के-से मुलायम बालों में फूलों की कलियाँ गूंथना,