पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/२४२

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गल्प-समुच्चय


अक्षरों को पवित्र करती हो? किस शुभ देश से तुम्हारा वियोग हुआ है?

कुमार के प्रश्नों का उत्तर न मिला। विशाल-लोल लोचनों से दो-चार बूँद आँसू टपक पड़े! मानो 'मानस-सरोवर' के रुचिर 'राजीव' से हंस द्वारा संचित—'मोती' झरते हों। क्यों? "सो सब कारण जान विधाता!"

कुमार को, आँसू टपकते देखकर, बड़ा पश्चात्ताप हुआ। उससे उसके रोने का कारण पूछने का उन्हें साहस न हुआ। उन्होंने सोचा कि नाम-धाम पूछने का तो यह नतीजा हुआ; दुबारा कुछ पूछने से न-जाने क्या-क्या गुल खिलेंगे!—अभी तो थोड़ी देर हुई कि, हास्यमुक्ता-माला से मुख-मण्डल मण्डित था। न-जाने क्यों अब अश्रु-बिन्दु-मुक्तावली गूंथकर स्वपद-तलस्थ-मृदुल-दूर्वादलों का मण्डन करने लगी! हाँ, जो दूर्वादल उसके शयन करके के लिये मृदुशय्या बनकर उसे सुख देते हैं, उन वन्य-शष्यों का मूल-सिञ्चन उसके लिये क्या कोई अनुचित काम है? जो हमारे सुख के लिये अपना सर्वस्व उत्सर्ग कर देता है, उसके लिये यदि हम अपने कलेजे का खून भी दे दें, तो कौनसी बड़ी बात है? यही सोचते-सोचते कुमार 'कहि न सकै कछु चितवत ठाढ़े।"

थोड़ी देर सँभलकर एक ओर बड़े जोर से दौड़ पड़े। फिर कुछ ही देर में, एक पलाश के दोने में वन्य कन्द-मूल-फल ले आकर तूती के सामने रख दिये । कमल के पत्ते को चारों ओर से