पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/२८८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
२७३
गल्प-समुच्चय

आया तो नहीं था?—उमा ने कुछ सोचकर उत्तर दिया—रतन आये थे। मैंने उन्हें खाने के लिए रोक लिया था।

उमा ने यह बात छिपा ली कि उसने रतन को स्वयं निमन्त्रित किया था। उमा और बिहारी का वैसा सम्बन्ध नहीं था, जिसमें भेद रखने की गुञ्जाइस नहीं थी। वे एक-प्राण दो शरीर नहीं थे। दो शरीर थे, दो प्राण थे, दोनों पृथक्, दोनों भिन्न—पृथ्वी और आकाश का अन्तर!

बिहारी के मुख से शराब की बू आ रही थी। उमा को बड़ी घृणा हुई। वह उठकर शयनागार में चली गई। बिहारी वहीं एक कोच पर लेट गये और यह ईरादा करते हुए कि अब चलते हैं, सो गए।

दूसरे दिन उमा ने बिहारी को वहीं कोंच पर पड़े हुए पाया। आठ बज चुके थे; लेकिन उन्हें अभी होश न था। काग़ज़ के कई पुर्जे बिहारी के कोट की जेब में आधे भीतर आधे बाहर निकले हुए दिखाई देते थे। रोशनदान से आती हुई सूर्य की किरणें उनके मुख पर पड़ रही थीं। कुतूहलवश उमा ने पुर्जे बाहर खींच लिये, उलटा-पलटा, पढ़ने की इच्छा हुई। पहला एक होटल का बिल था, दूसरा एक पत्र। पत्र में लिखा था——

'प्रिय बिहारी बाबू,

मुझे इस बात का बड़ा दुःख है कि उस दिन तुमसे एकान्त में मिलने का अवसर न मिला। मुझे आशा है, तुमने बुरा न माना होगा। तुम जानते हो, मुझे तुमसे कितना प्रेम है। पुरानी बातें इस