पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/३०८

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गल्प-समुच्चय

उनके कानों गूंज रहे थे। वे ज्यों-ज्यों विचार करते, उन्हें अपना ही दोष दिखाई देता। यदि मैं श्यामा के कृत्रिम प्रेम में न फँसता, तो आज यह दिन क्यों देखना पड़ता? यद्यपि मैंने स्वार्थ वश उमा से विवाह किया था; किन्तु उमा मुझसे प्रेम करती थी, यदि वह मुझसे प्रेम न करती होती, तो रतन को छोड़कर मुझसे विवाह ही क्यों करती? मेरे हृदय में शनैः-शनैः में अंकुरित हुआ—हाँ, यह निरन्तर सहवास के कारण अवश्य था। हम दोनों एक दूसरे के साथ सुखी थे; परन्तु मैंने स्वयं अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारी। उमा के प्रेम की अवहेलना की। ऐसी दशा में मुझसे उसके मन का फिर जाना स्वाभाविक ही था। यह मानव-स्वभाव है, इसमें उमा का दोष नहीं? सारा उत्तरदायित्व मुझ पर ही है। जब सारा दोष मेरा ही है, तब मुझे उमा से नाराज़ होने का कोई हक़ नहीं। अब क्या करुँ? उमा से मेल कर लेना चाहिए।

इस निश्चय के बाद बिहारी उठकर भीतर गये। ड्राइंग-रूम में दीवार पर लगी हुई घड़ी में डेढ़ बजा था। बिहारी ने सोचा—उमा सो रही होगी। वे शयनागार की ओर गये। धीरे से दरवाजा खोला और भीतर प्रवेश किया। मेज पर जलती हुई मोमबत्ती ऐसी जान पड़ती थी, मानों किसी क़बर पर जलता हुआ चिराग़ आँसू बहा रहा हो। उमा पलग पर पड़ी हुई थी। ऐसा जान पड़ता था, मानो कमरे में फैला हुआ प्रकाश उसके लावण्य का प्रकाश है। बिहारी धीरे-धीरे आगे बढ़े। वे झुके और उमा के