पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/५०

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(१) संन्यासी

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( १ )

लखनवाल, जिला गुजरात, का पालू उन मनुष्यों 72 में से था जो गुणों की गुथली कहे जाते हैं। यदि वह गाँव में न होता, तो होलियों में झाँकियों का, दीवाली पर जुए का, और दशहरे पर रामलीला का प्रबन्ध कठिन हो जाता था। उन दिनों उसे खाने-पीने तक की सुधि न रहती और वह तन-मन से इन कार्यो में लीन रहता था। गाँव में कोई गाने वाला आ जाता तो लोग पालू के पास जाते कि देखो कुछ राग-विद्या जानता भी है, या यों ही हमें गँवार समझकर धोखा देने आ गया है। पालू अभिमान से सिर हिलाता और उत्तर देता,—"पालू के रहते हुए तो यह असम्भव है, पीछे की भगवान जाने।" केवल इतना ही नहीं, वह बाँसुरी और घड़ा बजाने में भी पूरा उस्ताद था। हीर-रांझे का किस्सा पढ़ने में, तो दूर-दूर तक कोई उसके जोड़ का न था। दोपहर के समय जब वह पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर ऊँचे स्वर से जोगी और सहती के प्रश्नोत्तर पढ़ता, तो