पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/५३

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संन्यासी


यहाँ तक पहुँची, कि भाई-भावजें बात-बात में ताने मारने और घृणा की दृष्टि से देखने लगीं। मनुष्य सब कुछ सह लेता है; पर अपमान नहीं सह सकता। पालू भी बार-बार के अपमान को देखकर चुप न रह सका। एक दिन पिता के सामने जाकर बोला-"यह क्या रोज-रोज़ ऐसा ही होता रहेगा?"

पिता भी उससे बहुत दुःखी था, झल्लाकर बोला-

"तुम्हारे-जैसों के साथ इसी तरह होना चाहिए।"

“पराई बेटी को विष खिला दूँ?"

"नहीं, गले में ढाल लो। जगत् में तुम्हारा ही अनोखा ब्याह हुआ है।"

पालू ने कुछ धीरज से पूपा-"आप अपना विचार प्रकट कर दें। मैं भी तो कुछ जान पाऊँ।"

"सारे गाँव में तुम्हारी मिट्टी उड़ रही है। अभी बतलाने की बात बाकी रह गई है?"

"पर मैंने ऐसी कोई बात नहीं की, जिससे मेरी निन्दा हो।"

"सारा दिन स्त्री के पास बैठे रहते हो, यह क्या कोई थोड़ी निन्दा की बात है? तुम सुधर जाओ, नहीं सारी आयु रोते रहोगे। हमारा क्या है, नदी-किनारे के रूख हैं, आज हैं कल बह गये; परन्तु इतना तो सन्तोष रहे, कि जीते-जी अपने सब पुत्रों को कमाते-खाते देख लिया।"

यह कहते-कहते पिता के नेत्रों में आँसू भर आये। उसकी एक-एक बात जँची-तुली थी।