पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/५६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
४४
गल्प-समुच्च


फिर चञ्चल हो उठी। इस चञ्चलता को न खेल-तमाशे रोक सके, न मनोरञ्जक किस्से कहानियां। यह दोनों रास्ते उससे पद-दलित किये जा चुके थे। प्रायः ऐसा देखा गया है कि पढ़े-लिखे लोगों की अपेक्षा अनपढ़ और मूर्ख लोग अपनी टेक का ज्यादा खयाल रखते हैं और इसके लिये तन-मन-धन तक न्योछावर कर देते हैं। पालू में यह गुण कूट-कूट कर भरा हुआ था। माता पिता ने दुबारा विवाह करने की ठानी; परन्तु पालू ने स्वीकार न किया और उनके बहुत कहने-सुनने पर कहा कि जिस बन्धन से एक बार छूट चुका हूँ, उसमें दुबारा न फैलूंगा। गृहस्थ का सुख-भोग मेरे प्रारब्ध में न था, यदि होता, तो मेरी पहली स्त्री क्यों मरती। अब तो इसी प्रकार जीवन बिता दूँगा; परन्तु यह अवस्था भी अधिक समय तक न रह सकी। तीन मास के अन्दर-अन्दर उसके माता-पिता-दोनों चल बसे। पालू के हृदय पर दूसरी चोट लगी। क्रिया-कर्म से निवृत्त हुआ, तो रोता हुआ बड़ी भावज के पाँवों में गिर पड़ा और बोला-"अब तो तुम्ही बचा सकती हो; अन्यथा मेरे मरने में कोई कसर नहीं।"

भावज ने उसके सिर पर हाथ फैरकर कहा-मैं तुम्हें पुत्रों से बढ़कर चाहूँगी। क्या हुआ, जो तुम्हारे माता-पिता मर गये। हम तो जीते हैं।"

“यह नहीं, मेरे बेटे को सँभालो। मैं अब घर में न रहूँगा।"

उसकी भाभी अवाक् रह गई। पालू अब सम्पत्ति बाँटने के लिये झगड़ा करेगा, उसे इस बात की शङ्का थी; परन्तु यह