पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/५५

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संन्यासी


होती है। पालू ने भी उचित-अनुचित का विचार न किया और अकड़कर उत्तर दिया-"मैं इसी से खाऊँगा और देखूँगा कि मुझे चौके से कौन उठा देता है?"

बात साधारण थी; परन्तु हृदयों में गाँठ बंध गई। पालू को उसकी स्त्री ने भी समझाया, माँ ने भी; पर उसने किसी की बात पर कान न दिया, और बे-परवाई से सबको टाल दिया। दिन को प्रेम के दौर चलते, रात को स्वर्ग-वायु के झकोरे आते। पालु की स्त्री की गोद में दो वर्ष का बालक खेलता था, जिस पर माता पिता दोनों न्योछावर थे। एकाएक उजाले में अन्धकार ने सिर निकाला। गाँव में विशूचिका का रोग फूट पड़ा, जिसका पहला शिकार पालू की स्त्री हुई।

( ३ )

पालू विलक्षण प्रकृति का मनुष्य था। धीरता ओर नम्रता उसके स्वभाव के सर्वथा प्रतिकूल थी। वाल्यावस्था में वह बे-परवा था। बे-परवाई चरमसीमा पर पहुँच चुकी थी। आठ-आठ दिन घर से बाहर रहना उसके लिये साधारण बात थी। फिर विवाह हुआ, प्रेम ने हृदय के साथ पाँवों को भी जकड़ लिया। यह वह समय था, जब उसके नेत्र एकाएक बाह्य संसार की ओर से बन्द हो गये और वह इस प्रकार प्रेम-पास में फंस गया; जैसे-शहद में मक्खी। मित्र-मण्डली नोक-झोंक करती थी, भाई-बन्धु आँखों में मुसकुराते थे; मगर उसके नेत्र और कान-दोनों बन्द थे। परन्तु जबास्त्री भी मरगई, तो पालू की प्रकृति