पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/८२

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गल्प समुच्चय


स्त्री की कई स्थितियाँ हैं। वह बेटी है, बहन है, स्त्री है; परन्तु जो प्रेम उसमें माँ बनकर उत्पन्न होता है, उसकी उपमा इस नश्वर संसार में न मिलेगी। मुझे माता-पिता से प्रेम था; पति पर श्रद्धा। उनको देखने के लिए मैं कभी-कभी अधीर हो उठती थी; परन्तु उस अधीरता की, इस नई अधीरता के साथ कोई तुलना न थी, जो अपने बच्चे का मुख चूमते समय, उसका आँखों पर हाथ फेरते समय, उसे हृदय से लगाते समय, मेरे नारी-हृदय में उत्पन्न हो जाती थी, उस समय मैं घबराकर खड़ी हो जाती, और परमात्मा के विरुद्ध सैकड़ों शब्द मुख से निकाल देती। मैं चाहती थी, आह! नहीं बता सकती, कितना चाहती थी‌ कि मेरी आँखें एक क्षण के लिए खुल जायँ, और मैं अपने बच्चे को एक नज़र देख लूँ; परन्तु यह इच्छा पूरी न होती थी। मैं अपने दुर्भाग्य को अब अनुभव करने लगी।

(५)

धीरे-धीरे मेरी व्याकुलता ने उन्हें भी उदास कर दिया, जिस तरह एक घर में आग लग गई हो, तो धुआँ दूसरे घर में भी पहुँच जाता है। प्रायः चिन्तित रहने लगे। वे मेरे भावों को समझ गये थे। अब उनके स्वर में वह मनोहरता न थी, न शब्दों में वह सरसता थी। बात-चीत के ढंग में भी अन्तर आ गया था। बोलते-बोलते चुप हो जाते। निस्सन्देह उस समय यदि मेरे नेत्रों से अन्धकार का पर्दा उठ जाता, तो मैं उनके पलकों पर