पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/९३

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अँधेरी दुनिया


रहते। उन्होंने कचहरी जाना छोड़ दिया था। कहते थे––परमात्मा करे, मैं इस मुकदमे में जीत जाऊँ। मैं और कुछ नहीं चाहता, मेरा बच्चा बच जाय। जिस प्रकार हिरन अपने बच्चे को बचाने के लिये स्वयं अपने आप को मृत्यु के मुँह में दे देता है, उसी प्रकार उन्होंने सूरजपाल की खातिर अपना जीवन खतरे में डाल दिया। हर समय उसके साथ लेटे रहते थे। परिणाम यह हुआ कि सूरज पाल की सेवा-सुश्रषा[१] करते-करते आप भी बीमार हो गये। अब मेरे व्याकुल हृदय में तूफान उठने लगे। मेरे पास केवल फूल थे। और उन दोनों को, प्रकृति का निर्दयी हाथ, तोड़ने के पीछे पड़ा था; परन्तु मैंने अपनी जान लड़ा दी, और अपने दिखाई देनेवाले समान दिन-रात को उनकी सेवा में एक कर दिया। और परमात्मा ने मुझ अबला के परिश्रम को सफल किया––दोनों नीरोग हो गये।

मेरे आनन्द का ठिकाना न था। आँगन में उछलती फिरती थी, जैसे किसी का डूबा हुआ धन मिल जाय। उन्होंने आकर कृतज्ञता के भाव से मेरा हाथ अपने निर्बल हाथ में लिया और धीरे से कहा––"तुमने हमें मृत्यु के मुख से खींचा है, नहीं तो।"

मैंने उनके मुँह पर हाथ रख दिया और कहा––"बस, इसके आगे एक शब्द भी न कहो। मेरे कान यह सुनने की शक्ति नहीं रखते।"

वे चुप हो गये; परन्तु थोड़ी देर के बाद मुझे मालूम हुआ कि वे रो रहे हैं। मेरे हाथ पर पानी की दो गरम बूंदें टपकीं।

  1. 'शुश्रूषा' शुद्ध वर्तनी है। मूल पाठ में अशुद्धि है।