पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/९४

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गल्प-समुच्चय

"क्यों, रोते क्यों हो? अब तो कोई ख़तरा नहीं।"

यह सुनकर वह सिसकियाँ भर-भरकर रोने लगे। मैं उनके गले से लिपट गई, जिस प्रकार सूरजपाल मेरे गले से लिपट जाया करता है। मैंने पूछा––"तुम बताओ, तुम क्यों रो रहे हो? मेरा कलेजा फट जायगा।"

उन्होंने उत्तर देने की चेष्टा की; परन्तु उनके प्रत्येक शब्द को उनकी लगातार सिसकियों ने इस प्रकार निगल लिया, जिस प्रकार किसी अन्धी लड़की को नेत्र-कल्पनाओं को व्याकुलता निगल जाती है। वे रो रहे थे। जब दुःख का बोझ हलका हुआ और उनकी जिह्वा को बोलने की शक्ति प्राप्त हुई, तब उन्होंने मेरा हाथ अपने मुँह पर रख लिया और रुक-रुककर कहा––"यदि तुम देख सकतीं, तो तुम्हें ऐसा दृश्य दिखाई देता कि तुम मूर्च्छित हो जातीं।"

मैं कुछ समझ न सकी, मस्तिष्क पर जोर देते हुए बोली––"तुम्हारा क्या अभिप्राय है। साफ़-साफ़ कहो।"

"मेरी और तुम्हारे सूरजपाल की सूरत ऐसी बदल गई है कि देखकर डर लगता है।"

यह कहकर वह चुप हो गये।

मैं बैठी थी, खड़ी हो गई और चिल्लाकर बोली––"परन्तु मेरी आँखों में जो तुम्हारी सूरतें समा चुकी हैं, उन्हें कौन बदल सकता है। संसार की आँखों में तुम बदल जाओ; परन्तु मेरी आँखों में तुम सदा वैसे ही सुन्दर, वैसे ही मनोहर हो। मैं सोचती थी, परमात्मा ने दूसरी बार मेरी आँखें छीन कर मुझ पर