पृष्ठ:ग़बन.pdf/३७

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जालपा ने बिस्तर पर ते जरा खिसककर कहा-मैं बहुत जल्द चली आऊँगी । तुम गये और मैं आयी।

रमा ने बिस्तर खोलते हुए कहा-जी नहीं, माफ़ कीजिए, इस धोखे में नहीं आता । तुम्हें क्या, तुम तो सहेलियों के साथ विहार करोगी, मेरी खबर तक न लोगी, यहाँ मेरी जान पर बन आयेगी । इस घर में फिर कैसे कदम रखा जायेगा।

जालपा ने एहसान जताते हुए कहा-आपने मेरा बँधा-बँधाया बिस्तर खोल दिया, नहीं तो आज कितने आनन्द से घर पहुँच जाती। शहजादी सच कहती थी, मर्द बड़े टोनहे होते हैं। मैंने आज पक्का इरादा कर लिया था कि चाहे ब्रह्मा भी उतर आवे, पर मैं न मानूंगी । पर तुमने दो ही मिनट में सारे मंसूबे चौपट कर दिये । कल खत लिखना जरूर । बिना कुछ पैदा किये अब निर्वाह नहीं है।

रमा-कल नहीं, मैं इसी वक्त जाकर दो-तीन चिट्ठियाँ लिखता हू़्ं।

जालपा-पान तो खाते जाओ रमानाथ ने पान खाया और मर्दाने कमरे में खत लिखने बैठे। मगर फिर कुछ सोचकर उठ खड़े हुए और एक तरफ को चल दिये। स्त्री का सप्रेम आग्रह पुरुष से क्या नहीं करा सकता।

रमा के परिचितों में एक रमेश बाबू म्युनिसिपल बोर्ड में हेड क्लर्क थे। उम्र तो चालीस के ऊपर थी, पर ये बड़े रसिक । शतरंज खेलने बैठते तो सबेरा कर देते, दफ्तर भी भूल जाते । मै आगे नाथ न पीछे पगहा। जवानी में स्त्री मर गयी थी, दूसरा विवाह नहीं किया। उस एकांत जीवन में सिवा विनोद के और क्या अवलम्ब था । चाहते तो हजारों से वारे-न्यारे करते, पर रिश्वत की कौड़ी भी हराम समझते थे । रमा से बड़ा स्नेह रखते थे और कौन ऐसा निठल्ला था, जो रात-रात भर उनसे शतरंज खेलता! आज कई दिन से बेचारे बहुत व्याकुल हो रहे थे । शतरंज की एक बाजी भी न हुई। अखबार कहाँ तक पढ़ते । रमा इधर दो-एक बार आया अवश्य, पर बिसात पर न बैठा। रमेश बाबू ने मुहरे बिछा दिये, उसको पकड़कर

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ग़बन