पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१२९

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गुप्त-निबन्धावली राष्ट्र-भाषा और लिपि इस समय ब्रजभाषाकी जड़ कहते हैं अर्थात् जिसके आधारपर ब्रजभाषा बनी। उसकी नीव दसवीं ईसवी शताब्दिमें पड़ी होगी। अचानक मुसलमानों के इस देशमें घुस आने और आक्रमण करनेसे इस देशकी स्थिति और यहाँके धर्ममें एक बड़ा भारी परिवर्तन उपस्थित हुआ । आक्रमणकारी मुसलमानों ने यहाँके मन्दिरों और देवालयों के साथ जैसी क्रूरताका बरताव किया, उससे यहाँकी बची बचाई विद्याका भी धूलमें मिलजाना एक सहज बात थी। कारण यह कि वही मन्दिर और देवालय विद्याके भी भण्डार थे, जो आक्रमणकारियों ने तोड़ फोड़ कर धूलमें मिला दिये । बहुत कालतक सर्वसाधारणको अपने धन और प्राणों की रक्षाके लिये चिन्तित रहना पड़ा । विद्याकी चर्चा कौन करता ? जो कुछ हो, देशके इस परिवर्तनके साथ साथ देश भाषाका परिवर्तन भी विलक्षण रूपसे होने लगा। अरबी और तुर्की शब्दों से भरी हुई फारसी भाषाको लेकर मुसलमान इस देशमें आये थे। उनकी वह भाषा इस दशकी भाषामें मिलने लगी । यदि संस्कृत उस समय देश-भाषा य राज-दरबारकी भापा होती तो मुसलमानी भापा उसी में मिलती। पर वह तब केवल धर्म संबंधी भाषा थी, इससे म्लेच्छ भापाका एक शब्द भी उसमें न घुस सका । हिन्दू धर्म कुछ ऐसा विचित्र है कि उसकी पोथियाँ लिखनेको आज भी भिन्न भाषाके शब्द लेनेकी आवश्यकता नहीं होती, फिर उस समय तो क्या होती। इसीसे संस्कृत वैसीकी वैसी पवित्र बनी हुई है। पर उस समयकी देशभाषाने जिसका नाम अबसे ब्रजभाषा कहकर पुकारा जावेगा इस बिना बुलाये अतिथिका सत्कार किया। यद्यपि उस समयके हिन्दुओंको मुसलमानोंका बरताव देखकर उनसे बड़ी घृणा हुई थी, तथापि मुसलमानी भाषाके शब्दोंको वह अपनी भाषामें मिलने देनेसे न रोक सके। कैसे रोक सकते ? आठ पहर चौसठ घड़ीका उनका [ ११२ ]