पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१३७

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गुप्त-निबन्धावली राष्ट्र-भाषा और लिपि लिखी गजल बहुतही प्रसिद्ध है- जे हाले मिसकी मकुन तगाफुल, दुराय नैना बनाय बतियाँ । किताबे हिजरां नदारम ऐ जां, न लेहु काहे लगाय छतियां । शबाने हिजरां दराज चूँ जुल्फो, रोजे वसलत चुउम्र कोताह । सखी पियाको जो मैं न देखू तो कैसे का, अंधेरी रतियाँ। यकायक अजदिल दो चश्मे जादू, बसद फरेबम बुर्बुद तिसकीं। किसे पड़ी है जो जा सुनावे पियारे पीको हमारी बतियाँ । चू शमा सोजां चुजरह हैरां जे मेहरे आं मह बेगश्तम आखिर । न नींद नैना न अङ्ग चैना न आप आवे न भेजे पतियां । बहक्क रोजे विसाले महशर किदाद मारा फरेब खुसरू । लुभाय राखू तू सुन ऐ साजन जो कहने पाऊं दो बोल बतियाँ ।। इस गजलके पहले दो चरणों से प्रत्येक आधा-आधा फारसी है और आधा-आधा हिन्दी । आगेके दो-दो चरणोंमें पहला फारसी और दूसरा हिन्दी है। छः सौ वर्ष हो गये, अब भी इस गजलका आदर होता है। इससे पता लगता है कि हिन्दी उस समय कैसी थी। अथवा मुसल- मानोंके मुंहपर जो हिन्दी जारी थी वह कैसो थी। यह बात भी लक्ष्य करनेके योग्य है कि इस गजलमें स्त्री अपने पियाके वियोगका वर्णन करती है। संस्कृत और भाषाके कवियोंकी यही चाल है। वह स्त्रीकी ओरसे अपने पतिके विरहकी कविता करते हैं। फारसीके कवियोंकी चाल इससे भिन्न है। वह पुरुषका विरह वणन करते हैं और वह पुरुष भी स्त्रीके विरहमें पागल नहीं होता वरञ्च बहुधा किसी सुन्दर बालकके विरहमें प्रलाप करता है। आरम्भमें मुसलमान कवि भी हिन्दुस्थानी चालपर चले थे। पर पीछे उनको कविता फारसीके रंगमें शराबोर हो गई। इससे उर्दू में भी पुरुषका प्रेम पुरुषसे चलता है। उसी चालपर इस समय तकके उर्दू कवि चले जाते हैं। खुसरूने हिन्दीमें फारसी [ १२० ]