पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१५६

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हिन्दी-भाषा - - - मलय समीर बास सुख बासी। बेल फल सेजरि सुख दासी। हरियर भूमि कसूभी चोला । औ धन पिय संग रचो हिंडोला । नागमतीके बारहमासेमें आषाढ़का वर्णन सुनिये, गजब किया है- चढ़ा असाढ़ गगन धन गाजा । साजा विरह दन्द दल वाजा ! धूम स्याम धोरी धन धाये । स्वेत ध्वजा बक पांति देवाये। खडग बीज चमक चहुं ओरा । बूंद बान बरमहिं धन घोरा । उनई घटा आये चहुं फरी । कंन उबार मदनहीं घेरी । दादर मोर कोकिला पीऊ। गिरहिं बीज घट रहहि न जीऊ । पुक्ख नखत सिर ऊपर आवा । हो बिन नाह मंदिरको छावा । आद्रा लाग बीज मुँइ लेई । मो पिय बिन को आदर देई । जे घर कंता ते सुग्वी तेहि गारू तेहि गर्व कंत पियारे बाहरे हम सुग्घ भूला मब । आपाढ़की शोभाके सिवा हिन्दू स्त्रियोंके मनके भावोंको इसमें कभी सुन्दर झलक है। साथ-साथ सामयिक ज्योतिप भी बताता जाता है कि आर्द्रा नक्षत्र आरम्भ हो गया। बिजलो भूमिसे लग-लग जाती है इत्यादि । इसी बारहमासेके श्रावणका वर्णन और भी सुन्दर है-- सावन बरस मेह अत बानी। मरन परीहाँ बिरह झुरानी । लाग पुनरवसु पी उन देखा। भइ बावर कह कंत मरेग्वा । रकतकी आंसु परहि भूइ टूटी। रंग चलें जनु वीर बहूदी । इनमेंसे अन्तिम दो पंक्तियोंमें कविने कविताका शेष कर दिया है। सावनमें बीरबहूटी उत्पन्न होती है। वह ठीक लड़की बूंद सदृश होतो है। नागमती अपने पति राजाके वियोगमें है। वह रक्तके आंसुओंसे रोती है । वही आंसू बोर बहूटीको भांति रंगके चलते हैं । बीरबहूटीयां सावनकी शोभा हैं। पर नागमती वियोगमें रोती है। इससे यहाँ उसके रक्तमय आँसुही बीरबहूटी हैं। इसी प्रकार जहाँ क्षत्रियोंकी वीरता [ १३९ ]