पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१७८

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एक लिपिकी जरूरत लेखकने दिखाया है कि भारतवर्षमें छापेकी कल जारी होतेही बम्बई, काशी और कलकत्ते आदिमें संस्कृतके अच्छे-अच्छे ग्रन्थ देवना- गरी अक्षरोंमेंही छपे। इससे स्पष्ट है कि भारतवर्ष भरमें यही अक्षर सबसे अच्छे समझे गये हैं। फिर क्यों नहीं, इनका अधिक प्रचार किया जाय तथा छपने-लिखने दोनोंमें यही अक्षर चलें ? यदि विद्वान् लोग अपने प्रान्तीय अक्षरोंका पक्षपात कुछ देरके लिये छोड़कर देवनागरी अक्षरोंका विचार करें तो उनको आपसे आप मान लेना पड़ेगा कि अपने प्रान्तीय अक्षरोंका प्रचार घटाकर इन अक्षरोंका प्रचार बढ़ाना चाहिये । कई प्रान्तोंमें नागरी अक्षरोंहीकी प्रधानता है । युक्तप्रदेशमें नागरी अक्षर चालूही हैं और युक्त-प्रान्तमें संस्कृत और हिन्दीकी पोथियाँ इसी लिपिमें छपती हैं। पंजाबमें सिखोंके समयसे गुरुमुखी अक्षर जारी हो गये हैं, पर उनमें केवल सिख धर्मकी पुस्तकें ही छपती हैं। संस्कृत पुस्तक वहाँ भी देवनागरी अक्षरोंहीमें छपती हैं और इन्हीं अक्षरोंकी वहाँ प्रधानता है। काश्मीरमें सैकड़ों वर्षसे देवनागरी लिपि चली आती है । पञ्जाबमें भी गुरुमुखी अक्षर बहुत थोड़े लोग लिखते हैं। वह अक्षर नागरी अक्षरोंहीसे बने हैं और मिलते जुलते हैं। लिखनेमें वह देव- नागरीसे सुगम भी नहीं है। साथ ही यह हर्षका विषय है कि सिख- धर्मके प्रन्थ भी लाहोर आदिमें नागरीहीमें छपने लगे हैं। ____ महाराष्ट्र देशमें लिखनेके अक्षर अवश्यही मुड़िया हैं, पर पुस्तकोंके अक्षर वहां संस्कृत और मराठी दोनों भाषाओंमें देवनागरीही हो गये हैं। गुजरातियोंने अपने गुजराती अक्षर रखे हैं। उन्हींमें गुजराती भाषाकी पोथी छापते हैं, पर संस्कृत पुस्तकें वहाँ भी देवनागरीहीमें छपती हैं और गुजराती अक्षरोंकी पोथियोंमें भी जब बीच-बीच में संस्कृत श्लोक या संस्कृत नाम आते हैं तो वहां देवनागरी अक्षरही दिये जाते हैं । गुज- रातियोंको देवनागरी अक्षरोंके पढ़नेका वैसा ही अभ्यास है, जैसा गुज- [ १६१ ] ११