पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१८४

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हिन्दुस्तानमें एक रस्मुलखत हिस्सा छप चुका है। यह मज़मून बंगाली ज़बानमें था और छपा नागरी हरुफमें। इस मज़मूनका तर्जुमा या मतलब कभी “ज़माना” के नाज़रीनके लिये लिखा जायगा। जस्टिस साहबका यह मज़मून शाया होनेके बाद कलकत्तामें एक अंजुमन११ काइम हुई। जिसका नाम “एक लिपि विस्तारपरिषद्" हुआ। कलकत्ता बड़ाबाज़ारके श्रीविशुद्धानन्द सरस्वती-विद्यालयके साबिक प्रिंसिपल पाण्डेय उमापतिदत्त शर्मा बी० ए० इसके सेक्रेटरी और महामहोपाध्याय सतीशचन्द्र विद्याभूषण एम० ए० असिस्टेन्ट सेक्रेटरी हुए । इस अंजुमनसे “देवनागर" नामका एक माहवार रिसाला निकलना शुरू हो गया है। जिसमें हिन्दी, बंगाली, मरहठी. गुजराती, उर्दू, उड़िया, तामिल, वगैरह कितनी ही जुबानोंके मज़ामीन होते हैं। मगर हरुफ़ देवनागरी ही होते हैं। इस रिसालेका पहिला नम्बर निकल गया। इसमें ग्यारह हिन्दुस्तानी जुबानोंके मज़ामीन हैं। इससे ज़ाहिर हो जायगा, किस तरह देवनागरी-हरुफ़ हर मुल्क और हर सूबेकी बोलीको अदाकर देनेकी कुदरत रखते हैं। ___ बहुत अर्सा हुआ मरहठोंने अपनी जुबानके लिये देवनागरी हरुफ़ क़बूलकर लिये । अब मरहठी जुबानके कुल अखबार, रसायल और कुतब देवनागरी हरुफ़में शाया होते हैं। हिन्दी और मरहठी दो जुबानं नागरी हरुफमें लिखी जाती हैं। गुजरातियोंके खास गुजराती हरुफ़ हैं। यह नागरीसे बहुत मिलते-जुलते हैं। इनकी उम्र सौ सालसे ज्यादा नहीं है । इनमें हरकात।२को अलामते१३ नागरीसे निस्क। हैं । इसीसे संस्कृत जुबान इनमें सही नहीं लिखी जा सकती है। मजबूरन गुजराती लोग संस्कृतको नागरीमें लिखते हैं और अपनी गुजराती जुबानको गुजराती हरुफ में। आजकल गुजराती भी कोशिश कर रहे हैं, कि जल्द ११-संस्था । १२-मात्रा। १३-चिन्ह । १४-आधी । [ १६७ ]