पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/२७०

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सर सय्यद अहमदका खत हिन्दुओंसे मेल रखना मुझे नापसन्द नहीं था। मेरे ऐसे हिन्दू दोस्त थे, जिन्होंने मरते दमतक मुझसे दोस्ती निबाही और जिनकी सोहबतसे मुझे बड़ी खुशी हासिल होती थी। कालिजके लिये उनसे माकूल चन्दे मिले हैं। पञ्जाबमें कालिजके चन्देके लिये दौरा करनेके वक्त लेक्चरमें मैंने कहा था कि हिन्दू मुसलमानोंको में एकही आँखसे देवता हूं। क्या अच्छा होता जो मेरे एक ही आँख होती, जिससे मैं इन दोनोंको सदा एक ही आँखसे देखा करता ? अफसोस ! अपनी कौमकी शकस्ताहालीने मुझे उस सञ्च राम्तेसे हटाया। मैंने सन १८८८ ई० में इण्डियन नेशनल कांग्रेससे मुखालिफत करके हिन्दू-मुसलमानोंको दो आँखोंसे देखनेका खयाल पैदा किया और अपने उन्हीं सच्च और पुराने खयालातपर पानी फेरा, जिनका दावेदार कांग्रेससे पहले मैं खुद था ! खयाल करनेसे तअज्जुब और अफसोस मालूम होता है कि मैंने वह सच्चा और सीधारास्ता छोड़ा भी तो किसके कहनेसे कि जो 'असबावे बगावत' लिखनेके वक्त मेरे पिछलं खयालातका तरफदार था और उसीने मेरी उस उदृ किताबका अंग्रेजी तरजुमा कर दिया था ! काश ! सर आकलेण्ड कालविन इन सूबोंके लफटन्ट गवर्नर न होते और उसी हैसियतमें रहते, जैसे उस किताबके तरजमा करनेके वक्त थे ! मेरे अजीजों! जमानेकी रफ्तारको कोई रोक नहीं सकता। वह सबको अपने रास्तेपर घसीट ले जाती है। अगरचे तुम लड़के नहीं हो, जवान हो और माशाअल्लह तुममेंसे कितनोंहीके दाढ़ी मूंछ भो निकल रही हैं। मगर इस कालिजमें तुम परदेकी बूबूकी तरह रखे जाते हो, गैरके सायेसे बचाये जाते हो। तुम्हारे हर कामपर अंग्रेज प्रिन्सपल वगैरा वैसाही पहरा रखते हैं, जैसे दाया और मामा छ्छू गोदके और उङ्गलीके सहारेक बालकोंपर रखती हैं । पर इतनेपर भी तुम निरे गोदके बच्चे नहीं बने रह सके । बहुत दबनेपर तुम्हें जवानोंकी तरह हिम्मत करनी पड़ी। ( २५३ )