पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/२९१

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गुप्त-निषन्धावली संवाद-पत्रोंका इतिहास उर्दू लिटरेचरको बहुत कुछ उन्नति दी। उनमेंसे एक कसमण्डवी थे, जिनकी भाषाकी छटा और वर्णनका ढङ्ग देखनेके योग्य होता था। बहुत दिन हुए वह मर गये और फिर उस ढङ्गके लेख अवधपञ्चमें देख- नेमें नहीं आये। एक और लेखक सितमजरीफ थे। अब वह भी दुनियांसे उठ गये हैं । वह सचमुच मितमजरीफ थे । उनके लेख पढ़ते समय आंतोंमें बल पड़ जाते थे। वह प्रायः लखनऊकी बात लिखते थे। नवाबलोग बटेर कैसे लड़ाते हैं, मुकद्दमेंबाज अदालतोंमें मुकद्दमें कैसे करते हैं और किस प्रकार वह अदालती घसीटनमें पड़कर खराब होते हैं। लखनऊ के नवाबोंका क्या ठाटबाट है, लखनऊ के मेले, ठेलोंका क्या रंग-ढंग है, यही सब बात उनके लेग्यों में होती थीं। इन्हीं मामूली बातों- को वह ऐसे ढङ्गसे लिखते थे कि पढ़नेवाले मोहित हो जाते थे। पर केवल हंसी ही उनके लेखोंमें नहीं होती थी। उनमें मुहावरोंका ग्वजाना और लालित्यका ढेर होता था। सितमजरीफ मिरजाके उन लेखोंका सिल- सिला उनके साथ ही पूरा हो गया। और भी इसी प्रकारके कई लेखक अवधपञ्चको मिले थे। अपने अपने ढङ्गमें वह खूब लिखते थे । ___ जो लोग अवधपञ्चमें लिखते थे, उनमेंसे कई एकके एक आन थी । वह यह कि इन्होंने जब कभी कुछ लिखा अवधपञ्चहीमें लिखा । उस जमानेमें अवधपञ्चके भी यह आन थी कि जो लेखक किसी और पत्रमें लिखता था, उनके लेख वह नहीं छापता था । और भी कितनी ही विशेषताएँ अवधपञ्चमें ऐसी थीं, जो भारतवपके अखबारोंमें होनी चाहिये। वह इस देशके त्यौहारों और उत्सवोंको कभी नहीं भूलता था। त्योहार चाहे हिन्दुओंके हों चाहे मुसलमानोंके और चाहे कृस्तानोंके, सबपर वह कुछ न कुछ लिखता था। बड़े दिनकी डाली और नये दिनके साकीनामे उसके बंधे हुए लेख थे। साकीनामोंका ढंग मुसलमान अपने देशसे लाये हैं। साकी शराब पिलानेवालेको कहते हैं। अरब और ईरानमें [ २७४ ]