पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/२९३

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गुप्त-निबन्धावली सवाद-पत्रोंका इतिह - - सम्पादक महोदयकी एक चिठ्ठी मिली है। उसका कुछ अंश नीचे दिर जाता है- "मुकर्रमी तसलीम । खत पहुंचा । बहुत बजा है। अवधपञ्च मुर हाथोंसे इस वजहसे निकलता है कि कोई उठानेवाला नहीं। दो ए सतरोंके सिवा हाथसे लिख सकता न मुंहसे बोल सकता हूं। कुछ नौकर हिम्मत करके निकाल देते हैं । दस सालसे फालिजमें गिरिफ्ता लबेगोर हूँ। जब किसी तरफ इतमीनान नहीं, तो क्या इन्तजाम है सके। अखबार सिरफ इस लिये निकालता हूं कि जीते जी मर नह सकता, वरना इस आरिजेके हाथों - 'मुझे क्या बुरा था मरना । अगर एक बार होता।' अवधपञ्च जिन्दा अग्खबार में नहीं कि इसका जिक्र हो। ह गुजश्ता जमानेमें तो था।" चिट्ठी पढ़कर जी भर आया। जो लोग उद्दे अखबारोंकी तरफदारी जमीन आसमान एक किये डालते हैं और हिन्दीका नाम सुनते ही खुदकुशीको तय्यार होते हैं, वह एकबार अपने अखबारोंक हालतपर निगाह डालं। मुसलमानोंको तालीमी कानफरन्सके साथ उड़ अखबारोंकी कानफरन्स होनेकी भी बात सुनी है। देग्व, उसका ध्यान ऐस बातोंपर होता है या और ही व्यर्थ बातोंपर। अवधपंच उर्दुका बादशाह है। यदि अच्छी उर्दू कहीं है तो वह अवधपंचके पुराने २७ सालके फाइलोंमें बन्द है। यदि अच्छी उट्टकी रक्षा करना है तो उद्देवाले पहले अवधपंचकी रक्षा कर। कोई अठारह उन्नीस साल हुए लग्वनऊसे “महशर” नामका एक कागज निकला था। कोई माल भर भी न चला, पर उर्दू लिटरेचरका अच्छा कागज था । गोरखपुरसे “रियाजुल अखवार” एक पुराने ढांचेका