पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३०९

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गुप्त-निबन्धावली संवाद-पत्रोंका इतिहास कोई दो डेढ़ साल चलकर बन्द होगया। इन गुलदस्तोंसे इतनाही लाभ हुआ कि अमीर, दाग, जलाल आदि उर्दूके कई अच्छे अच्छे गजल- नवीस कवियोंको हिन्दुस्थानके बहुतसे उर्दुवाले जान गये । __पयामेयारके नामकी नकल पर कन्नौजसे मुंशी भगगवां रहीमने “पयामेआशिक" निकाला। इसमें साथ साथ कुछ हंसी दिल्लगीके लेख भी निकलते थे। पर सबही ऐसे वैसे होते थे, कामका एक नहीं। यह एक बड़ी दिल्लगीकी बात है कि इन गुलदस्तोंको बहुधा वही लोग निकालते थे, जो इतर भी बेचते थे । लखनऊक निसार हुसैन और कन्नौज- के रहीम दोनों ही इतरकी दुकान करते थे । यह कागजी गुलदस्ते उन्हींके प्रबन्ध रूपी इतरसे सुगन्धित होते थे। इस लखका लेखक भी उनकी बूबाससे एकबारही वञ्चित नहीं रहा। उसके तोड़ हुए दो चार जङ्गली फूल भो कभी-कभी इन गुच्छोंमें शामिल हो जाते थे। उस समय हवा ही ऐसी थी । यहीसे उद में नाविल नवीसीकी नीव पड़ी । मौलवी अब्दुल हलोम शरर जो कभी-कभी पयामेयारमें एक आध कविता अंगरजी- एशियाई मिश्रित ढंगकी लिग्ब दिया करते थे, नाविल लिखने लगे। अन्तमें उन्होंने “दिल गुदाज" नामका एक मासिक पत्र निकाला जिसमें नाविल- के ढंगके कुछ लग्ब निकलते थे और कुछ नये ढंगकी कविता । अम्बालसे एक मजनने “गुंचये मुराद" नामका गुलदस्ता निकाला था, उसमें गजलों- के सिवा कुछ नये ढंगकी कविताका ढंग भी डाला गया था। पर वह चला नहीं। इन गुलदस्तोंको इतनो धूम हुई थी कि गोरखपुरके छोटेसे हमी दिल्लगोके पत्र "फितने" ने एक "इत्रफितना" निकाला था, जिसमें इन गुलदस्तोंके अच्छे-अच्छ शेर चुनकर छापे जाते थे। वह साप्ताहिक निकलता था। अब भी मिट नहीं गया है। गुलदस्तोंका नाम निशान भी एकदम मिटा नहीं है, अभी उनमंसे कई जारी हैं। पर अब उनका वह समय नहीं। वह धूम धाम भी नहीं । [ २९२ ]