पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३३७

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गुप्त-निबन्धावली संवाद-पत्रोंका इतिहास तऊं कोटिससि कोटिमदन सम, तुव मुख विनुटग देखें। धीरज होत न याहि तनकहूं समाधान केहि लेखें । निस दिन परम अमृत समलीला जेहि मानै अरु गावै । तेहि बिनु अपने चखसों देख किमि यह धीरज पावै । दरमन कर रहैं लीलामें जिय भरि आनन्द लूटै । तृप्त होहिं तब मन इन्द्रिनको अनुभव भुस लै कूट । सम्पति सपनेकी न कामकी मृगतृश्ना नहि नीकी । हरीचन्द बिन सुधा जिय आवै कैसे छछिया फीकी ।। गङ्गा पतितनको आधार । यह कलिकाल कठिन मागरसों तुमहिं लगावत पार ।। दरस परस जलपान कियेन तारे लोक हजार । हरिचरनारविन्द मकरन्दी सोहत सुन्दर धार ।। अवगाहत नरदेव सिद्धमुनि करि अस्तुति बहुवार । हरीचन्द जन तारिन देवी गावत निगम पुकार ।। __वह धुजकी फहरानि न भूलत । उलटि उलटिके मोदिसि चितवनि रथ हांकनि हरिकी हिय सूलत । लैगये सब सुख साथहि मोहन अब तो मदन सदा हिय हलत । मो मुख सुमिरि सुमिरि के सजनी अजहूं जिय रसबेली फूलत । ले आवो कोउ मोढिग हरिको विरह आगि अब तन उनमूलत । [ ३२० ।