पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३७४

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हिन्दी-अखबार हिन्दी अखबार पर मानहानिकी नालिश की थी। हिन्दुस्थान भरके अखबारों में उसको चर्चा थी, पर राजस्थान समाचारमें कभी इतना भो नहीं लिखा गया कि अजमेरमें कोई मुकद्दमा चलता है, कई साल तक उक्त पत्र इसी प्रकारकी कम हिम्मतोमें पड़ा रहा। कितनी ही बार उसके लेग्व इस प्रकारके होते थे, जिनसे यही समझमें आता था कि सम्पादक महाशय इच्छासे नहीं लिग्वते । दृसरोंके अनुरोधसे लिखते हैं। बीच-बीचमें ऐसा भी होता था, सम्पादकका लेग्व कुछ नहीं, दुसरे अग्वबारोंके लेख सम्पादकीय म्तम्भमें नकल हुए चले जा रहे हैं। जिस अखबारसे नकल होते हैं, उसका हवाला दिया दिया, न दिया न दिया। ___ कई साल पहले उक्त पत्रमें चित्र छपने लगे थे। चित्र अच्छे होते थे, छपते अच्छे नहीं थे। अग्वबारके नामके नीचे “मचित्र” शब्द भी लिया जाने लगा था। पर कुछ दिन बाद चित्रोंका सिलसिला ठीक नहीं रह सका। तब जिस पत्रमें कोई चित्र छपता, उसपर सचित्र शब्द लिखा जाने लगा और जिसमें चित्र न होता, उसमें कुछ नहीं। इसी प्रकार कई साल तक उक्त पत्र साप्ताहिक चलता रहा और एक ग्खुशाम- दाना-सी पालिसी रही। पीछे वह सप्ताहमें दो बार किया गया। उस समय आकार १६ पृष्ठ की जगह १२ पृष्ठ हो गय।। मप्ताहमें दो बार होनेकी दशामें उसकी दशा पहलेसे और भी ढीलो हो गई थी। कभी-कभी पत्रके निकलनेमें देर हो जाती थी, एकाध नम्बर गायब भी हो जाता था। इतनेपर भी उसके मालिककी प्रशंसा करनी चाहिये कि उसने अपने पत्रको पीछे नहीं हटने दिया, वरञ्च और भी आगे बढ़ा दिया। अब उक्त पत्र दैनिक निकलता है। एक साल पूरा होकर और कई नम्बर अधिक निकल गये। इस समय आकार ठीक “हिन्दोस्थान"का-सा है, अर्थात् एक