पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४१

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पण्डित देवीसहाय यत्र सुदी एकादशी बुधवार (संवत् १६६० ) को रातके १० बजे कलकत्ता बड़ाबाजारके प्रसिद्ध पंडित देवीसहायजी स्वर्गगामी हुए। वह एक बड़े नामी पंडित और विचारशील पुरुप थे । उनका जन्मस्थान राजपूतानेका “पाटन" गाँव है। वहीं उनका स्वर्गवास हुआ। चैत्र सुदी २ को वह कलकत्तसे स्वदेशको गये और ७ को वहां पहुंचे। ४ दिन पीछे प्राण त्याग दिया। उनको संग्रहणीकी कठिन पीड़ा थी और अबक उसका तीसरा आक्रमण हुआ था। ___पंडित देवीसहायजीके उद्योगसे मारवाड़ियों में कई प्रकारको विद्या और धर्म-सम्बन्धी चर्चा फैली। कलकत्ता-बड़ाबाजारकी धर्मसभा और उसकी पाठशालाके बननेकी जड़ वही थे । चैत्र सुदी १५ संवत् १९३६ से उन्होंने “धर्मदिवाकर" नामका एक धर्म-सम्बन्धी मासिक-पत्र निकाला था। वह कोई पांच माल तक चलाया। उसमें जैसे सुन्दर और सारगर्भित लेख उक्त पंडितजी लिखते थे, उनसे उनकी विद्वत्ताका भलीभांति परिचय मिलता है। कह सकते हैं कि फिर हिन्दी भापामें शास्त्रोंका तत्व समझानेवाला वैसा मासिक-पत्र नहीं निकला। उस समय वह व्याख्यान भी अच्छा देसकते थे। हमने उनका पहला व्याख्यान संवत १६४४ में कनखलमें सुना था, जब कि श्रीभारत-धर्म महामण्डलकी नींव हरिद्वार में पड़ी थी। नींव पड़नसे पहले पं. दीनदयालुजी कलकत्त आये थे, तब वह बहुत कम उमर थे। पं० देवीसहायजीकी संगतसे उनके हृदयमें महामण्डल जैसी विराट हिन्दू सभाका अङ्कुर प्रस्फुटित हुआ था। धर्म-दिवाकरमें अच्छे लेख लिखनेके सिवा वह मार्कण्डेय-पुराणपर एक सुन्दर संस्कृत टीका करगये हैं, जो अभी छपी नहीं है। इसके