पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४२२

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हिन्दी-अखबार आलोचना हुई है और स्वाधीनतासे राय दी गई है। लार्ड रिपनकी राजनीति पर अच्छे लेख लिखे गये हैं। साहब लोगोंके अंगरेजी अखबार भारतमें सदासे अगरेज राजपुरुषोंकी हिमायत और भारत- वासियोंका विरोध करते आये हैं, उनकी भी बहुत ठीक आलोचना की गई है। मुलतानमें उस साल हिन्दू मुसलमानोंमें फसाद हुआ था। अगरेजी अखबार उसमें हाकिमोंकी तरफदारी करते थे। इस विषयमें कई लगातार लेख भारतमित्रमें निकले हैं और खूब मौकेके निकले हैं। मूल्य कम होना साप्ताहिक होनेके बादसे भारतमित्रका मूल्य शहरके ग्राहकोंसे वार्षिक १||) और बाहरवालोंसे ३०) था, क्योंकि उस समय अखबारोंका महसूल आध आना था। प्रति सप्ताह आध आनेके हिसाबसे साल- भरका डाक महसूल १||2) होता है। लार्ड रिपनने कृपाकरके तीन तोलेके अखबारोंका महसूल एक पैसा कर दिया। इससे भारतमित्रने भी २४ नवम्बर सन् १८८१ ईस्वीसे अपना दाम घटा दिया। बाहरवालोंसे ३-1 की जगह २।।) लेने लगा। ____५ जनवरी १८८२ ईस्वीके भारतमित्रमें नये वर्षका लेख लिखते हुए गत वर्षकी समालोचना हुई है। उसमें हिन्दी समाचार पत्रोंकी भी बात है। उसी सालसे भारतमित्रका ढङ्ग और अच्छा और साफ हुआ है। उस साल अच्छे अच्छे विषयों पर लेख लिखे गये हैं । २६ जनवरीके अंकमें पहला लेख प्रेस एक्टके उठ जानेका है। देशी अखबारोंके उक्त कानूनने हाथ पैर जकड़ दिये थे। उसके मारे वह अपना स्वाधीन लेख तो क्या स्वाधीन अगरेजी लेखोंका तरजमा तक नहीं छाप सकते थे। इस एक्टके दूर हो जानेसे भारतमित्रको और मी स्वाधीनतासे लिखनेका अवसर मिला। आरम्भहीसे भारतमित्रका कामकी बातोंकी ओर ध्यान रहता है। शहर हो या मुफस्सिल, दोनोंकी [ ४०५ ]