पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४२६

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हिन्दी-अखबार - सुना है कि स्वामीजी भारतमित्रके इस प्रकार सफाईसे लिखनेसे अप्रसन्न नहीं होते थे वरञ्च वह उसके शुभचिन्तक थे। हिन्दीका आन्दोलन सन् १८८४ ईस्वीके भारतमित्रमें हिन्दीका बड़ा आन्दोलन दिखाई देता है । लगातार कितने ही नम्बरोंमें सम्पादक महाशयने हिन्दीकी हिमायतमें लेख लिखे हैं । इसके सिवा कितने ही प्रेरित पत्र निकले हैं। इसमें एक एक अङ्कमें कई कई लेख हिन्दीहीके लिये दिखाई देते हैं। बहुत जम कर आन्दोलन किया गया था। “हिन्दू पेट्रीयट" उस समय बङ्गालियोंके चलाये हुए अंगरेजी-पत्रों में नामी था। उसने भी हिन्दी- की तरफदारीमें एक अच्छा लेख लिखा था। जिस प्रकार बिहारियोंके कानमें कभी कोई फूंक मार जाया करता है कि बंगालसे बिहारको अलग करा लेना चाहिये, उसी प्रकार कुछ पञ्जाबियोंको भी सनक आया करती है कि पञ्जाबकी भाषा हिन्दी नहीं पञ्जाबी है। इससे पञ्जाबकी भाषा क्या चीज है, इस बातको दिखानेके लिये २७ मार्च सन् १८८४ के भारतमित्रमें एक अच्छा लेख निकला है। इस हिन्दीके आन्दोलनका यह फल हुआ कि मेरठ जैसे उर्दूके दास शहरमें देवनागरी प्रचारिणी सभा बन गई। इस विषयमें लिखापढ़ी और जोश यहां तक बढ़ा हुआ था कि सिरसाके स्वर्गीय काशीनाथ खत्रीने इङ्गलंडमें हिन्दीपर आन्दो- लन करनेकी सलाह दी थो लार्ड रिपन वर्षके अन्तकी संख्याओंमें लार्ड रिपनके अच्छे कामोंकी आलोचनामें कई एक लगातार लेख निकले हैं। दिसम्बरकी संख्यामें स्वर्गीय भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्रजीका भेजा हुआ "रिपनाष्टक" छपा है। ११ दिसम्बरके पत्रमें एक और जोरदार लेख उसी विषयमें छपा है। उसके अन्तमें बड़ेबाजारवालोंको सलाह दी है, वह इस प्रकार है- [ ४०९ ।