पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५८१

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गुप्त-निबन्धावली आलोचना-प्रत्यालोचना क्या दिव्य साहित्य है। इसीके लिये वकटेश्वर 'तारा'को हिन्दी साहित्यका चमकता हुआ तारा कहता है ! कहां है काशीकी नागरी- प्रचारिणी सभा ? उसे आनन्दके मारे बांसों उछलना चाहिये कि उसके एक प्रधान मेम्बर गोस्वामीजी हिन्दी साहित्यको कितना ऊंचा लेगये हैं। दारा और जहांनाराको कुछ और बात सुनिये- "दारा-प्यारी शाहजादी। अफसोस सद अफसोस है कि तुम्हारे दिल तक इश्ककी वह आंच हरगिज नहीं पहुंची है जिसके श्वाले (?) में मैं भुन-भुनकर कबाब हुआ जाता हूं । सच है दर्द-दिलकी कैफियतसे वे बिलकुल नावाकिफ रहते हैं, जिन्होंने इजरते इश्कके दाममें अपनी जान कभी न फंसाई हो । जहां--(मुस्कराकर) बेशक, बेशक और वाकई जनाब ! भला यह कमतरीन इश्ककी लज्जत क्या जाने । अफसोस ! खुदाने शाहजादियांको इश्ककी लज्जतसे बिलकुलही महरूम किया । दाराने मनही मन कहा-“जी हां सही है। बीबीको एक शब भी बगैर किसीको बगलगीर बनाये चैन न आता होगा।" ____ क्या सहयोगी 'वंकटेश्वर'ने तारामें यह वाक्य नहीं पढ़े ? क्या इन्हीं वाक्योंको लेकर 'तारा' हिन्दी साहित्यका चमकता हुआ तारा है ? हम नागरी प्रचारिणी सभाको सावधान करते हैं कि यदि सचमुच वह हिन्दीकी उन्नति चाहती है, तो सबसे पहले 'तारा' पढ़े और गोस्वामीजी महाराजको उनकी पुस्तकके गुण-दोष समझावे कि वह कैसा गन्दा और भयानक काम कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि हमें इस विषयमें और आगे बढ़ना न पड़े। क्योंकि इस पुस्तकमें आगे चलकर इससे भी बढ़कर भयानक और वाहियात बाते हैं। -भारतमित्र सन् १९०३ ई० ।