पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५८४

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अधखिला फूल सन्नाटा बढ़ रहा है, ऊमस बड़ी है, पौन डोलती तक नहीं, लोग घबरा रहे हैं, कोई बाहर खेतोंमें घूमता है, कोई घरकी खुली छतोंपर ठण्डा हो रहा है, ऊमससे घबराकर कभी-कभी कोई टिटिहरी कहाँ बोल उठती है। ___ भीतोंसे घिरे हुए एक छोटेसे घरमें एक छोटासा आंगन है, हम वहीं चलकर देखना चाहते हैं, इस घड़ी वहाँ क्या होता है। एक मिट्टीका छोटासा दीया जल रहा है, उसके धुंधले उजालेमें देखनेसे जान पड़ता है, इस आंगनमें दो पलंग पड़े हुए हैं । एक पलंगपर एक ग्यारह बरसका हंसमुख लड़का लेटा हुआ उसी दीयेके उजालेमें कुछ पढ़ रहा है। दूसरे पलंग पर एक पैंतीस-छत्तीस बरसकी अधेड़ इसतिरी लेटी हुई, धीरे-धीरे पंखा हांक रही है, इस पंखेसे धीमी-धीमी पौन निकल कर उस लड़के तक पहुंचती है, जिससे वह ऐसी ऊमसमें भी जी लगाकर अपनी पोथी पढ़ रहा है। इस इसतिरीके पास एक चौदह बरसकी लड़की भी बैठी है। यह एकटक आकाशके तारोंकी ओर देख रही है, बहुत बेर तक देखती रही पीछे बोली मा! आकाशमें वह सब चमकते हुए क्या हैं ? ____ माने कहा, बेटी। जो लोग इस धरतीपर अच्छी कमाई करते हैं, मरनेपर वही लोग सरगमें बास पाते हैं, उनमें बड़ा तेज होता है, अपने तेजसे वह लोग सदा चमकते रहते हैं। दिनमें सूरजके तेजसे दिखलाई नहीं पडते, रातमें जब सुरजका तेज नहीं रहता, हम लोगोंको उनकी छवि देखनेमें आती है। यह सब चमकते हुए तारे सरगके जीव हैं, इनकी छटा निराली है, रूप इनका कहीं बढ़कर है। न इन लोगोंके पास रोग आता, न यह बूढ़े होते, दुख इनके पास फटकता तक नहीं। यह जो तारोंके बीचसे उजली धारसी दक्खिनसे उत्तरको चली गई है, आकाश गङ्गा है, इसका पानी बहुत सुघरा मीठा और ठंडा होता है, वह लोग इसमें नहाते हैं, मीठे अनूठे फलोंको खाते हैं, भीनी-भीनी महकवालं अनोखे फूल सूंघते हैं, भूख प्यासका डर नहीं, कमानेका खटका