पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६२४

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देव-देवी स्तुति EEEEEEE FREE (८) पुनि पुनि डूबत तऊ न पावत थाह तापे मिलत न निकसनकी राह । भीम निविड़ अति दुरजय तमको घेर । वाढत चारहु दिकसों ढेरहिं ढर । हों तो डब रह्यो १ तासु मंझार । नापै डूबत दोग्वत सब संमार ।। (६) जहं सब ये कौन उबारहि काहि । कोहै ऐसो दोप लगावहिं जाहि । देखो मा! मम हियको घोर मसान । जा महं चिन्ता दहकत चिता समान । ताती सांसनके बहु उड़हिं अंगार । छाई भाप चहूं दिस धूआंधार ।। फूटे खंडहर सम यह मेरो देह । सूखे हाड़ चाम भूतनको गेह दिन दिन बाढ़त तामहं पोच बिचार । मनहु होरही भूतनकी भरमार | एक डरावत एक दिखावत त्रास । एक खोलि मुख करन, चहत मा ग्रास ।। (११) कोई आंत निकारत खंचत खाल । कोई चाटत रक्त किये मुख लाल ।