पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६२७

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दुर्गा-स्तवन (१) आज मधुर धुन बजत सैल-पति भवन बधाई ! नाचत गावत बहु किन्नरि सुर ताल मिलाई । बहु बिधि फूले फूल पवन सौरभ फैलावत । विकसे कमल तडागन महं सोभा सरसावत । गिरिपुर वासिनको आनन्द कह्यो नहीं जाई । आज हिमाचलके महलन एक कन्या आई ।। सरद कालके प्रात ज्योति चहुँ दिस फैलाई । सिंह चढ़ी बालिका एक पर्वत पै आई। महिष मर्दिनी कन्या दसभुज जाके सोहैं । कर जोरे सब भक्त खरे वाको मुख जोहैं। बन्दीजन भये मुदित तासु बिरदावलि गावें । मधुर गीत उल्लास भरे चहुँ दिस फैलावै ।। सर्व भूत मय शक्ति स्वरूपिनि शक्ति तुम्हारी । को बरनन कर सकै तुम्हारी महिमा मा री ! तव लीलासों ब्यापि रह्यो है यह जग सारो। तेरे ही बल को है चारों ओर पसारो। तेरे बल रवि तपत बहत अति वायु भयङ्कर । कुपति हुतासन दाह करत उमड़त रखाकर ।। [ ६१० ]