पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६७२

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शोभा और श्रद्धा केते जन्म विताय बहुरि या जग महं आवै तुम्हरे उन चिर मर्त्यगीत कह सुनहिं सुनावै । राख्यो सञ्चय करि जिन महं या जगको सम्बल सोक, सान्ति, भय, ज्ञान, दुःख, सुग्व, हास्य, अम्र जल । अहो स्वर्ग कविराज ! स्वर्गको गान सुनाओ एक बार स्वर्गकी देव ! वह छवि दिखराओ। कहं कैसो सुरलोक अहै कैसो सुख वामें किहि प्रकार सुख सान्तिभाव राजन है तामें ? किते कोटि ब्रह्माण्ड किते कोटिन बल द्वारा--- चालत हैं तह, अहैं किते रवि ससि नभ तारा ? केते ब्रह्मा, विष्ण, किते सुरपति त्रिपुरारी केते दीप्त पुञ्जमय दिव्य कलेवर धारी ? कौन भांति तहं फल खिलत वायू झकझोरत सोतवती किमि बेग सहित बहु सोतन छोरत ? कैसे सुन्दर विपिन तहाँ कसे ऋतु आवत कसे भोग विलास राग रस रङ्ग बढ़ावत ? कैसी तहां सुरम्य सुहावनि फूली कुंज कैसे पुञ्ज पुञ्ज अलिगन तिन ऊपर गुंजे ? कैसे तहां तड़ाग खिले कसे तहं सतदल केसो सुन्दर स्वच्छ सरस सीतल तिनको जल ? और तहां किहि भांति मीनगन खेल दिखावें पंछीगन मीठी लयसे निज गान सुनावै ? सुन्यो स्वर्गके माहं विराजत नन्दन कानन वाकी छबि दिखराय देहु है कैसो वह बन ? कैसे वाके पारिजात गहने फूलनके [ ६५५ ]