पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/७१

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गुप्त-निब-धावली चरित-चर्चा - वह अपौरुषेय नहीं मानते थे, परन्तु वह जानते थे कि इसमें बहुत कुछ सार है । वह इस बातको नहीं समझ सके कि वेद मामूली पुस्तकोंकी भांति पढ़नेकी चीज नहीं है, वरञ्च काममें लानेकी चीज है। परन्तु एक कृस्तान हिन्दृ-धर्मकी इतनी निगूढ़ बातको ममझ भी कैसे सकता है ! आज जब कि वेदके पढ़ने पढ़ानेवाल आर्य लोगोंकी सन्तानही वेदको लेकर नाना प्रकार के खिलवाड़ करती है, उसके कपोल कल्पित अर्थ करती है, तो वह भिन्न धर्मी, भिन्न देशवामी वेदकी नली तक कैसे पहुंच सकते हैं । मेक्समूलरने, तथापि पठन-पाठनमें बहुत समय लगाया । ऋग्वेद छापकर प्रकाश किया, उसका अङ्गरजी अनुवाद भी प्रकाश किया । वेदके प्रकाश करनेमें मेक्समूलरने मबसे प्रशंमाक योग्य यह कार्य किया कि उममें अपनी इच्छाको दग्बल नहीं दिया। म्वच्छाचारितासे तत्वा- लोचना करनेका अपलाप नहीं किया। वह नहीं जानते थे कि वेदको कसे मजाय, तथापि अपनी बुद्धिक अनुसार जैमा बना ; वैमा सजाया और अनुवाद भी जैसे उनसे बनमका, किया। उनके वेदसे भारतवर्षका बहुत कुछ उपकार हुआ, उन्हींका छापा हुआ ऋग्वेद इस ममय भारतवपके ब्राह्मण पण्डितोंके पास है। उनके अंगरेजी वेदसे अंगरेजी पढ़ लोग कुछ कुछ भ्रममें भी पड़े हैं। उनकी समझमें यही आया कि वेद प्राचीन आर्य किसानोंका गीत है, परन्तु मे समूलरका कुछ दोष नहीं है, जिन लोगोंकी समझमें ऐमी बान आई है, उनकी ममझमें इससे अधिक और कुछ नहीं आमकता था। जो कुछ हो, मेक्समूलरका जितना हम आदर कर, कम है । वह भारतवासी नहीं थे, आर्य-मन्तान नहीं थे, आर्य्य धर्मावलम्बी नहीं थे, यहाँ तक कि आर्य-देशमें पैदा भी नहीं हुए थे, ऐसे मनुष्यका जीवन, संस्कृतकी महिमा-प्रचार करनेमें बीत जाय, यह एक बड़ीही विलक्षण बात है। इस संस्कृतकी अवनतिके समयमें आर्य- मन्तानकी इस गिरी हुई दशामें मेम्समूलर संस्कृतकी चर्चाहीमें लिप्त [ ५४ ]