पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/७१८

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हंसी-दिल्लगी बहुत बहकी बहकी न वात करो, न मायेसे तुम आप अपने डरो। जरा मुंह पे पानीके छींट लगाव, यह सब रातभरकी खुमारी मिटाव । तुम्हारी ही है हिन्दमें सबको चाह, तुम्हारे ही हाथों है सबका निबाह । तुम्हारा ही सब आज भरते हैं दम ; यह सच है, तुम्हारे ही सिरकी कमम । तुम्हारी ही खातिर हैं छत्तीम भोग, कि लट्ट हैं तुम पे जमानेके लोग । जो हैं चाहते उन पे रीझो रिझाव, कोई कुछ जो बैंडी कहे मौ सुनाव । में शाहोंकी गोदीकी पाली हुई, मेरी हाय यों पायमालो हुई ! निकाले जुबां फिरती हूं बावली, खुदाया मैं दिल्लीकी थी लाडली । अदाय बलाकी सितमका जमाल, वह सजधज कयामत वह आफतकी चाल | मेरे इशकका लोग भरते थे दम, नहीं झूठ कहती खुदाकी कसम । यह आफत लड़कपनमें आनेको थी, जवानी अभी सिर उठानेको थी। निकाले थे कुछ-कुछ अभी हाथ पांव, चमक फैलती जाती है गांव-गांव । [ ७०१ ]